
भारत माता की गौरवगाथा का प्रतीक ‘वंदे मातरम्’ अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर कल संसद में विशेष चर्चा आयोजित की जाएगी, जिसकी शुरुआत लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि देश की आज़ादी, स्वाभिमान और एकता का प्रतीक है। संसद में होने वाली यह चर्चा भारत के स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक चेतना को याद करने का अवसर बनेगी।
वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में महान लेखक और कवि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत पहली बार 1876 में लिखा गया और बाद में उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित हुआ। आज़ादी की लड़ाई में इस गीत ने करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाई। अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए वंदे मातरम् प्रेरणा का स्रोत बना और यह नारा बनकर जन-जन की आवाज़ में गूंजा।
150वीं वर्षगांठ के अवसर पर संसद में होने वाली चर्चा का उद्देश्य नई पीढ़ी को इस गीत के ऐतिहासिक महत्व और उसके विचारों से जोड़ना है। प्रधानमंत्री मोदी अपने संबोधन में वंदे मातरम् की यात्रा, उसकी प्रासंगिकता और आज के भारत में उसके अर्थ पर प्रकाश डालेंगे। माना जा रहा है कि वे देश की विविधता में एकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को रेखांकित करेंगे।
इस विशेष सत्र में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी अपने विचार रखेंगे। वंदे मातरम् का लोकतांत्रिक और संवैधानिक इतिहास, संविधान सभा में इसकी भूमिका और स्वतंत्र भारत में इसकी स्वीकृति जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी। यह कार्यक्रम केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र की साझा विरासत को याद करने और सम्मान देने का प्रयास है।
आज के बदलते समय में, जब वैश्विक चुनौतियाँ और आंतरिक मुद्दे सामने हैं, वंदे मातरम् जैसे गीत देशवासियों को एकजुट होने की प्रेरणा देते हैं। संसद में होने वाली यह चर्चा राष्ट्रप्रेम, कर्तव्य और एकता के संदेश को मजबूत करेगी। 150 वर्षों की इस गौरवशाली यात्रा के साथ वंदे मातरम् आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता संग्राम के दौर में था।



