देश की राजनीति में गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की भूमिका और उनकी फंडिंग को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की नई रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ एक साल के भीतर इन पार्टियों की आय में 223% की वृद्धि दर्ज की गई है। ये वो राजनीतिक दल हैं जिन्हें चुनाव आयोग की मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन फिर भी इन्होंने करोड़ों रुपये का चंदा हासिल किया है — और यही बात लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रही है।
ADR द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में इन गैर मान्यता प्राप्त दलों की कुल आय ₹23.09 करोड़ थी, जो 2023-24 में बढ़कर ₹74.86 करोड़ हो गई। यह वृद्धि अपने आप में चौंकाने वाली है, खासकर तब जब इन दलों की न तो कोई विशेष राजनीतिक पकड़ है, और न ही बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ने की क्षमता। सवाल उठता है कि फिर इन्हें इतने भारी चंदे क्यों और कहां से मिल रहे हैं?
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि अधिकांश चंदे की जानकारी अधूरी या अपारदर्शी है। कई पार्टियों ने IT रिटर्न तो दाखिल किए, लेकिन चंदे के स्रोत और दाताओं की जानकारी नहीं दी गई। इससे शक होता है कि कहीं ये दल केवल “फंडिंग की खपत” के लिए तो इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं, यानी फर्जी पार्टियों के जरिए काले धन को सफेद करने का जरिया?
इस रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है कि वह गैर मान्यता प्राप्त दलों की ऑडिटिंग और निगरानी को सख्त करे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ट्रेंड आने वाले चुनावों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है, क्योंकि बिना पारदर्शिता के चंदा मिलने का मतलब है कि धन का स्रोत और उद्देश्य दोनों संदिग्ध हैं।
यह मामला देश के लोकतांत्रिक तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को उजागर करता है। जहां एक ओर आम नागरिक ईमानदारी से टैक्स भरता है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक पार्टियों के लिए काले धन के रास्ते खुले होना एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।



