
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में असम को लेकर ऐतिहासिक और समकालीन संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि अतीत में असम को पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की साजिश रची गई थी, लेकिन राज्य के जागरूक नागरिकों और राष्ट्रहित में काम करने वाली ताकतों ने उसे सफल नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि असम की भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक विविधता और सीमावर्ती संवेदनशीलता के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से घुसपैठ की चुनौती झेलता रहा है, जिसका असर जनसंख्या संतुलन, संसाधनों और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ा। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि आज भी कुछ लोग और समूह घुसपैठियों को बचाने और उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगे हुए हैं, जिसे उन्होंने देश के हितों के खिलाफ बताया। उनका कहना था कि अवैध घुसपैठ केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, स्थानीय पहचान और नागरिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार सीमाओं की सुरक्षा, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और संवैधानिक प्रक्रियाओं के पालन के प्रति प्रतिबद्ध है, और इसी दिशा में पारदर्शी तथा न्यायसंगत नीतियों पर काम किया जा रहा है। उन्होंने असम समझौते, नागरिकता से जुड़े कानूनी प्रावधानों और अद्यतन प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका उद्देश्य किसी के साथ अन्याय करना नहीं, बल्कि वास्तविक नागरिकों को न्याय और सुरक्षा देना है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि विकास, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों के विस्तार से असम को मजबूत किया जा रहा है ताकि युवाओं को बेहतर भविष्य मिले और बाहरी दबावों के प्रति राज्य की क्षमता बढ़े। अपने संबोधन में उन्होंने विपक्ष पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि तुष्टिकरण की राजनीति ने समस्याओं को और जटिल बनाया, जबकि समाधान के लिए साहसिक और दूरदर्शी फैसलों की जरूरत थी। अंत में पीएम मोदी ने असम के लोगों से एकजुट रहने, लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा रखने और राष्ट्रहित में लिए जा रहे कदमों का समर्थन करने की अपील की, ताकि राज्य की अस्मिता, सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित की जा सके।



