
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि “अमेरिकी वोटर्स को वेनेजुएला पर हमला पसंद आया” सुनने में जितना सीधा लगता है, जमीनी हकीकत उतनी सरल नहीं है। अमेरिका की राजनीति में विदेश नीति हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रही है और किसी भी देश पर सैन्य कार्रवाई को लेकर जनता की राय एकरूप नहीं रहती। वेनेजुएला के संदर्भ में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। ट्रंप समर्थक वर्ग, विशेषकर कट्टर रिपब्लिकन वोटर्स, लंबे समय से वेनेजुएला की समाजवादी सरकार को अमेरिका विरोधी और असफल मॉडल मानते रहे हैं। इस वर्ग को लगता है कि सख्त रुख अपनाकर अमेरिका ने लोकतंत्र और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा की। इसी सोच के आधार पर ट्रंप यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वोटर्स ने इस रुख को सराहा। हालांकि, अमेरिका का बड़ा मध्यमवर्गीय और स्वतंत्र वोटर वर्ग युद्ध और सैन्य हस्तक्षेप के प्रति काफी सतर्क रहता है। इराक और अफगानिस्तान युद्धों के लंबे और महंगे अनुभवों ने अमेरिकी समाज को यह सिखाया है कि किसी भी विदेशी सैन्य कार्रवाई का बोझ अंततः आम नागरिकों पर ही पड़ता है। कई सर्वे और जनमत अध्ययनों में यह सामने आया है कि अमेरिकी मतदाता घरेलू मुद्दों—जैसे महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं और आव्रजन—को विदेश नीति से अधिक प्राथमिकता देते हैं। वेनेजुएला के मामले में भी अधिकांश अमेरिकियों की चिंता वहां के तेल संसाधनों या सरकार से अधिक अपने देश की आर्थिक स्थिति को लेकर रही है। इसके अलावा, लैटिन अमेरिकी मूल के अमेरिकी नागरिकों में भी मतभेद साफ दिखते हैं। क्यूबा और वेनेजुएला से आए कुछ प्रवासी सख्त नीति के पक्षधर हैं, जबकि अन्य इसे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाने वाला कदम मानते हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी और मानवाधिकार संगठनों ने भी वेनेजुएला पर हमले या दबाव की नीति को लेकर सवाल उठाए हैं और इसे कूटनीतिक समाधान से जोड़ने की वकालत की है। कुल मिलाकर, ट्रंप का यह दावा उनके समर्थक आधार तक सीमित सच्चाई जरूर रखता है, लेकिन पूरे अमेरिकी वोटर समुदाय की भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। जमीनी हकीकत यह है कि अमेरिकी जनता युद्ध से थकी हुई है और वह ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देती है जो विदेशों में टकराव बढ़ाने के बजाय देश के भीतर स्थिरता और समृद्धि पर ध्यान दें।



