
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां इजरायल को निशाना बनाए जाने के आरोपों के बीच अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के कुछ जजों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। इस फैसले का खुलासा अमेरिकी सीनेटर और वरिष्ठ नेता मार्को रूबियो ने किया, जिसके बाद वैश्विक कूटनीति में हलचल तेज हो गई है। अमेरिका का कहना है कि ICC के कुछ जज अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर राजनीतिक एजेंडे के तहत फैसले ले रहे हैं और विशेष रूप से इजरायल को अनुचित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। वाशिंगटन का मानना है कि यह कदम न केवल इजरायल की संप्रभुता के खिलाफ है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करता है। रूबियो ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और यदि कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है, तो उस पर कार्रवाई जरूरी है। इन प्रतिबंधों के तहत संबंधित जजों की अमेरिकी संपत्तियों पर रोक, वीज़ा प्रतिबंध और वित्तीय लेन-देन पर पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। इस फैसले पर दुनिया भर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जहां इजरायल ने अमेरिका के इस कदम का स्वागत किया है, वहीं कई मानवाधिकार संगठनों और यूरोपीय देशों ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता में दखल बताया है। आलोचकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है और शक्तिशाली देशों को जवाबदेही से बचने का रास्ता मिल सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका का तर्क है कि ICC का गठन कुछ सीमाओं के साथ हुआ था और वह ऐसे देशों पर अधिकार नहीं जता सकता जो उसके सदस्य नहीं हैं। यह विवाद केवल इजरायल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक न्याय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और शक्ति संतुलन से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े हो गए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका के इस फैसले का ICC की कार्यप्रणाली, इजरायल-फिलिस्तीन विवाद और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर क्या असर पड़ता है।



