
भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के लिए आज से दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठेंगे। यह बैठक खास इसलिए भी है क्योंकि यह ‘जेन जी’ आंदोलन के बाद पहली बार हो रही है, जिसने नेपाल की राजनीति और युवाओं में नई चेतना पैदा की थी। अब जब दोनों पड़ोसी देश आपसी रिश्तों को मजबूत करने और सीमाओं पर स्पष्टता लाने के प्रयास में हैं, तो यह वार्ता बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, यह बैठक नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित होगी, जिसमें भारत की ओर से विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और सर्वे ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि शामिल होंगे। वहीं, नेपाल की तरफ से विदेश मंत्री और सीमा आयोग के अधिकारी मौजूद रहेंगे। चर्चा का मुख्य विषय लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र रहेगा, जिन पर दशकों से दोनों देशों के बीच मतभेद जारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह वार्ता केवल सीमा समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारत-नेपाल के द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा मिल सकती है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक रिश्ते गहरे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक असहमति के कारण संबंधों में ठंडक आ गई थी। अब दोनों पक्ष संवाद के माध्यम से समाधान खोजने के इच्छुक हैं।
भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि सीमाओं पर समाधान इतिहास, भूगोल और पारस्परिक सहमति के आधार पर किया जाएगा। वहीं, नेपाल ने भी इस बार सकारात्मक रवैया दिखाया है और विवाद को कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने की इच्छा जताई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह बैठक सफल रहती है, तो यह न केवल सीमा विवाद के समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग का नया अध्याय भी खोलेगी। दोनों देशों के नागरिकों को उम्मीद है कि यह संवाद विश्वास बहाली का माध्यम बनेगा और भारत-नेपाल की मित्रता फिर से नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगी।



