मालेगांव ब्लास्ट केस में अदालत के हालिया फैसले ने देश की राजनीति में एक बार फिर उबाल ला दिया है। फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम से सार्वजनिक माफी की मांग की है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने इस मामले को “हिंदू आतंकवाद” के नाम पर राजनीति के लिए इस्तेमाल किया था और निर्दोषों को बदनाम किया गया।
भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि वर्षों तक चले इस मामले में जिस तरह से सबूतों की कमी, गवाहों के मुकरने और राजनीतिक हस्तक्षेप की बात सामने आई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस केस को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की थी। भाजपा नेताओं ने यह भी कहा कि यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं है, बल्कि एक राष्ट्रीय चरित्र को बदनाम करने की साजिश थी।
वहीं दूसरी ओर, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, “अगर कोई दोषी नहीं है, तो फिर 6 निर्दोष लोग मारे कैसे गए? उनका खून किसके सिर है?” ओवैसी ने यह भी आरोप लगाया कि इस केस में न्याय प्रणाली और जांच एजेंसियों ने अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभाई। उन्होंने इसे “न्याय से वंचित” करने वाला फैसला बताया।
इस मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर काफी लंबा रहा है। 2008 में मालेगांव में हुए धमाके में 6 लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों घायल हुए थे। प्रारंभ में इसकी जांच एटीएस ने की और फिर एनआईए के हाथों में आई। केस में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित सहित अन्य को आरोपी बनाया गया था।
हालांकि, लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया और कई मोड़ों के बाद अब इस केस में अदालत का फैसला आ चुका है, लेकिन इससे जुड़े राजनीतिक और सामाजिक सवाल अभी भी जिंदा हैं।
कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई औपचारिक माफी नहीं दी गई है, बल्कि कुछ नेताओं ने इस मामले को “जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव” की परिणति बताया है। वहीं भाजपा इस फैसले को नैतिक जीत मान रही है।
इस मुद्दे ने एक बार फिर न्याय, राजनीति और धार्मिक पहचान के आपसी संबंधों को केंद्र में ला खड़ा किया है। आम जनता के बीच भी यह बहस चल रही है कि क्या ऐसे संवेदनशील मामलों को राजनीति से पूरी तरह दूर रखा जा सकता है?



