
करीब आठ साल के लंबे अंतराल के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का चीन दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। यह वही ब्रिटेन है जिसने कोरोनाकाल के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए चीनी टेक कंपनी हुआवे (Huawei) को अपने 5G नेटवर्क से बाहर कर दिया था। उस फैसले को अमेरिका के दबाव और पश्चिमी देशों की सामूहिक रणनीति से जोड़कर देखा गया था। लेकिन अब हालात बदले नजर आ रहे हैं। चीन पहुंचते ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका अपनी जगह एक अहम साझेदार है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार के लिहाज से चीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दरअसल, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और कई अहम सप्लाई चेन का केंद्र भी। ब्रिटेन, जो ब्रेक्जिट के बाद नए व्यापारिक साझेदारों की तलाश में है, उसके लिए चीन के साथ रिश्तों में संतुलन बनाना मजबूरी बनता जा रहा है। ब्रिटिश पीएम ने यह भी संकेत दिया कि उनका देश चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग की नीति अपनाना चाहता है। इसका मतलब यह है कि जहां सुरक्षा और संवेदनशील तकनीक के मामलों में सख्ती बरती जाएगी, वहीं व्यापार, निवेश और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाया जाएगा।
चीन दौरे के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री और चीनी नेतृत्व के बीच व्यापार, निवेश, शिक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर चर्चा हुई। दोनों देशों ने आर्थिक संबंधों को स्थिर और व्यावहारिक दिशा में आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। ब्रिटिश पीएम का यह बयान कि “अमेरिका अपनी जगह है, लेकिन चीन जरूरी है” सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि लंदन अब केवल वॉशिंगटन की लाइन पर चलने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा पश्चिमी देशों की चीन नीति में धीरे-धीरे आ रहे बदलाव को भी दर्शाता है। जहां पहले चीन को पूरी तरह से अलग-थलग करने की बात होती थी, वहीं अब “डी-रिस्किंग” यानी जोखिम कम करने की नीति पर जोर दिया जा रहा है। कुल मिलाकर, ब्रिटिश प्रधानमंत्री का यह चीन दौरा सिर्फ एक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में संतुलन साधने की कोशिश का प्रतीक है।



