
अमेरिका की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी को भारतीय व्यंजन पालक पनीर की महक को ‘बदबू’ कहने के मामले में भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इस विवाद में यूनिवर्सिटी को नस्लीय भेदभाव और सांस्कृतिक असंवेदनशीलता के आरोपों के तहत 200,000 डॉलर (करीब 1.6 करोड़ रुपये) का हर्जाना देना पड़ा। मामला तब शुरू हुआ जब एक भारतीय मूल के कर्मचारी/छात्र ने कैंपस में अपना पारंपरिक भोजन गर्म किया, जिस पर कुछ सहकर्मियों ने उसकी महक को अपमानजनक शब्दों में ‘स्मेली’ और ‘डिस्गस्टिंग’ बताया। शिकायतकर्ता का कहना था कि यह टिप्पणी केवल भोजन तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसकी सांस्कृतिक पहचान को नीचा दिखाने वाली थी। बार-बार की गई ऐसी टिप्पणियों से मानसिक प्रताड़ना बढ़ी और अंततः उसने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। जांच के दौरान सामने आया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शुरुआती स्तर पर मामले को गंभीरता से नहीं लिया और शिकायत के समाधान में देरी की। यही लापरवाही यूनिवर्सिटी के लिए भारी पड़ गई। कानूनी प्रक्रिया में यह माना गया कि किसी भी संस्कृति के भोजन पर ‘बदबू’ जैसी टिप्पणियां नस्लीय पूर्वाग्रह को बढ़ावा देती हैं और कार्यस्थल/शैक्षणिक वातावरण को असुरक्षित बनाती हैं। समझौते के तहत यूनिवर्सिटी ने हर्जाना देने के साथ-साथ डाइवर्सिटी, इक्विटी और इन्क्लूजन (DEI) से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू करने, स्पष्ट एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नीतियां बनाने और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने का वादा किया। इस घटना ने वैश्विक स्तर पर यह बहस तेज कर दी है कि बहुसांस्कृतिक समाज में भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान का विषय भी होता है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने यूनिवर्सिटी के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि भारतीय भोजन अपनी खुशबू और विविधता के लिए जाना जाता है, और उसे ‘बदबू’ कहना अस्वीकार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संस्थानों के लिए एक चेतावनी है कि सांस्कृतिक संवेदनशीलता को हल्के में नहीं लिया जा सकता। कुल मिलाकर, यह मामला याद दिलाता है कि विविधता का सम्मान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार से भी झलकना चाहिए।



