
सिलिकॉन वैली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रफ्तार जितनी तेज़ हो रही है, उतनी ही आक्रामक होती जा रही है टेक कंपनियों के बीच टैलेंट की जंग। इसी कड़ी में मेटा (पूर्व में फेसबुक) के एक पूर्व कर्मचारी ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि आज AI के दौर में कंपनियां एक-दूसरे के इंजीनियर “चुराने” की होड़ में लगी हुई हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि एक तरह की टैलेंट वॉर बन चुकी है, जहां मोटे पैकेज, स्टॉक्स और आकर्षक ऑफर्स के दम पर कर्मचारियों को तोड़ा जा रहा है।
पूर्व कर्मचारी के मुताबिक, खासकर जनरेटिव AI और बड़े लैंग्वेज मॉडल्स के आने के बाद अनुभवी AI इंजीनियरों और रिसर्चर्स की मांग कई गुना बढ़ गई है। गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट, ओपनएआई और कई स्टार्टअप्स एक-दूसरे के टॉप टैलेंट को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। कई बार ऐसा होता है कि किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा इंजीनियर अचानक प्रतिद्वंद्वी कंपनी से ऑफर पाकर टीम छोड़ देता है, जिससे चल रहे प्रोजेक्ट्स और रिसर्च पर सीधा असर पड़ता है।
मेटा के पूर्व कर्मचारी ने यह भी कहा कि इस तरह की “पोचिंग कल्चर” से लंबे समय में इनोवेशन को नुकसान हो सकता है। जब कंपनियां अपने लोगों को रोकने के बजाय सिर्फ दूसरों के टैलेंट को खरीदने पर ध्यान देती हैं, तो स्थिरता खत्म हो जाती है। कर्मचारियों में भी यह भावना पनपती है कि वे किसी मिशन का हिस्सा नहीं, बल्कि एक कमोडिटी बन गए हैं, जिसकी कीमत हर कुछ महीनों में बदल जाती है।
हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि टेक इंडस्ट्री की प्रकृति ही ऐसी है जहां टैलेंट की आज़ादी और बेहतर अवसरों की तलाश स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ पैसे और पावर के दम पर AI की रेस जीती जा सकती है? उनके अनुसार, भविष्य उन्हीं कंपनियों का होगा जो न सिर्फ बेहतरीन इंजीनियरों को हायर करें, बल्कि उन्हें सीखने, रिसर्च करने और लंबे समय तक टिके रहने का माहौल भी दें।
कुल मिलाकर, यह बयान सिलिकॉन वैली की उस सच्चाई को उजागर करता है, जहां AI की चमक के पीछे एक कड़ी और कभी-कभी अनहेल्दी प्रतिस्पर्धा चल रही है। AI की दौड़ में आगे निकलने की चाहत ने टैलेंट को सबसे बड़ा हथियार बना दिया है, और यही आने वाले समय में टेक इंडस्ट्री की दिशा तय करेगा।



