
भारत में आने वाले चुनावों के मद्देनज़र देश की कई राज्य सरकारें महिलाओं को लुभाने के लिए जमकर पैसा खर्च कर रही हैं। हर राज्य सरकार महिलाओं के लिए नई-नई योजनाएं ला रही है — कहीं मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जा रही है तो कहीं सीधे खाते में आर्थिक मदद दी जा रही है। लेकिन इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इस “महिला कल्याण” के नाम पर हो रहा यह खर्च आखिर देश की आर्थिक स्थिति पर कितना बोझ डाल रहा है?
हाल ही में आई रिपोर्ट्स के अनुसार, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली और तेलंगाना जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए चलाई जा रही मुफ्त या सब्सिडी योजनाओं पर सरकारें भारी राशि खर्च कर रही हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक की ‘गृहलक्ष्मी योजना’ के तहत हर महिला मुखिया को ₹2,000 महीना दिया जा रहा है। इससे राज्य के खजाने पर हजारों करोड़ रुपये का बोझ पड़ा है। इसी तरह, दिल्ली में महिलाओं को बसों में मुफ्त यात्रा, बिजली सब्सिडी और पानी माफ जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं, जिनका असर राज्य के बजट पर साफ दिखने लगा है।
तमिलनाडु में ‘मकला निधि योजना’ और आंध्र प्रदेश की ‘वाईएसआर चेल्ला अम्मा योजना’ जैसी योजनाएं भी बड़ी संख्या में महिलाओं को लाभ दे रही हैं, लेकिन इनसे राज्यों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार, कुछ राज्यों का कर्ज उनके कुल सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 40% से भी ज्यादा हो चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक कल्याण योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन जब इन्हें राजनीतिक लाभ के लिए बिना वित्तीय स्थिरता के शुरू किया जाता है, तो यह दीर्घकालिक संकट को जन्म दे सकता है। इससे न केवल राज्यों की विकास योजनाएं प्रभावित होती हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों पर भी कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर की जा रही घोषणाओं के पीछे छिपा यह आर्थिक संकट सरकारों के लिए आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती बन सकता है। आवश्यक है कि सरकारें संतुलन बनाते हुए योजनाएं चलाएं ताकि जनता को राहत भी मिले और आर्थिक सेहत भी बरकरार रहे।



