
मिडिल ईस्ट में एक बार फिर भू-राजनीतिक हलचल तेज हो गई है, जहां अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने तनाव को और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाने का संकेत दिया, वहीं ईरान ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी संप्रभुता और सैन्य तैयारी पर जोर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में इजरायल की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है, क्योंकि आमतौर पर इजरायल इस तरह के मामलों में खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल पर्दे के पीछे अपनी रणनीति पर काम कर रहा है और सही समय का इंतजार कर रहा है। ऐसे संवेदनशील माहौल में भारत की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। भारत के मिडिल ईस्ट के सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित और मजबूत संबंध हैं, चाहे वह इजरायल हो, ईरान हो या खाड़ी देश। भारत की प्राथमिकता अपने ऊर्जा हितों की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और वहां रह रहे करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत किसी भी तरह के टकराव से बचते हुए कूटनीतिक समाधान पर जोर देता रहा है। इसके अलावा भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति के तहत किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचता है और सभी देशों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है। हाल के वर्षों में भारत ने इजरायल के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है, वहीं ईरान के साथ चाबहार पोर्ट जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर भी काम जारी रखा है। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत है। मौजूदा हालात में भारत लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाने को तैयार है। कुल मिलाकर, ट्रंप के बयान, ईरान के इनकार और इजरायल की रणनीतिक चुप्पी के बीच भारत एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में उभर रहा है, जो न केवल अपने हितों की रक्षा कर रहा है बल्कि क्षेत्रीय शांति बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।



