
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने के बजाय ऑब्जर्वर के तौर पर भाग लेकर एक संतुलित कूटनीतिक संदेश दिया है। इस पहल को वैश्विक स्तर पर संघर्षों को कम करने और प्रमुख देशों के बीच संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया बताया जा रहा है। हालांकि, भारत ने इस मंच से दूरी बनाते हुए संकेत दिया है कि वह किसी भी नई बहुपक्षीय व्यवस्था में शामिल होने से पहले उसके उद्देश्यों, संरचना और दीर्घकालिक प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन करना चाहता है। भारत की विदेश नीति पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि नई दिल्ली रणनीतिक स्वायत्तता को सर्वोपरि रखती है और किसी भी वैश्विक समूह में शामिल होने से पहले अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है।
भारत का ऑब्जर्वर के रूप में शामिल होना यह दर्शाता है कि वह वैश्विक शांति और स्थिरता के मुद्दों पर संवाद के लिए खुला है, लेकिन औपचारिक प्रतिबद्धताओं से फिलहाल बचना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अमेरिका के साथ अपने मजबूत संबंधों को बनाए रखते हुए भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलन साधने की नीति पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में जब विश्व कई भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रहा है, भारत का यह कदम एक सोच-समझकर उठाया गया कूटनीतिक निर्णय माना जा रहा है। आने वाले समय में यदि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की भूमिका और प्रभाव स्पष्ट होते हैं, तो भारत अपनी भागीदारी पर पुनर्विचार कर सकता है। फिलहाल, ऑब्जर्वर की भूमिका निभाकर भारत ने यह संकेत दे दिया है कि वह वैश्विक पहलों में रुचि तो रखता है, लेकिन बिना स्पष्ट एजेंडा और पारदर्शी ढांचे के किसी औपचारिक गठजोड़ का हिस्सा बनने में जल्दबाजी नहीं करेगा।



