
रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका की ओर से संभावित टैरिफ लगाने की चेतावनी ने एक बार फिर वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वॉशिंगटन की इस सख्त भाषा के बीच भारत ने भी साफ संकेत दे दिया है कि उसके लिए सबसे ऊपर 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा जरूरतें और आर्थिक हित हैं। भारतीय पक्ष का मानना है कि बढ़ती आबादी, तेजी से फैलती अर्थव्यवस्था और उद्योगों की मांग को देखते हुए सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे में कोई भी फैसला राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा, न कि बाहरी दबाव में।
दरअसल, यूक्रेन संकट के बाद रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते वैश्विक तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। इस दौरान भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अपने आयात बिल को संतुलित रखने की कोशिश की। इससे देश में महंगाई को काबू में रखने, पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर करने और विकास की रफ्तार बनाए रखने में मदद मिली। यही वजह है कि नई दिल्ली बार-बार यह दोहरा रही है कि उसकी ऊर्जा खरीद पूरी तरह बाजार आधारित है और जहां बेहतर कीमत व शर्तें मिलेंगी, वहीं से सौदा किया जाएगा।
अमेरिका की ओर से टैरिफ की बात ऐसे समय आई है जब दोनों देशों के बीच सामरिक और आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं। रक्षा, तकनीक, सेमीकंडक्टर, शिक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सार्वजनिक चेतावनियां रिश्तों में असहजता जरूर पैदा कर सकती हैं, लेकिन दोनों पक्ष संवाद के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे। भारत ने भी संकेत दिया है कि वह अपने साझेदारों की चिंताओं को समझता है, मगर राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से पीछे हटना संभव नहीं है।
भारत की दलील यह भी है कि यूरोप समेत कई देश अब भी अलग-अलग रूपों में रूसी ऊर्जा संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए केवल भारत को निशाना बनाना उचित नहीं होगा। नई दिल्ली बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर जोर देती रही है। यही नीति उसे अलग-अलग देशों के साथ संतुलन बनाकर चलने की ताकत देती है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह बयानबाजी किसी ठोस आर्थिक कदम में बदलती है या फिर कूटनीतिक बातचीत से मामला सुलझ जाता है। फिलहाल भारत का रुख स्पष्ट है—ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और 140 करोड़ लोगों का हित किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव से बड़ा है।



