
नाटो (NATO) प्रमुख के हालिया बयान ने एक बार फिर वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा हालात में यूरोप अपनी सुरक्षा अकेले सुनिश्चित नहीं कर सकता और उसे अमेरिका की सैन्य, रणनीतिक और तकनीकी सहायता की लगातार जरूरत है। यह बयान ऐसे समय आया है जब यूक्रेन युद्ध, रूस-नाटो तनाव और मध्य-पूर्व में बढ़ती अस्थिरता ने यूरोपीय देशों की सुरक्षा चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है। नाटो चीफ के अनुसार, यूरोप के पास मजबूत अर्थव्यवस्था और आधुनिक सेनाएं होने के बावजूद सामूहिक रक्षा के लिए जो सैन्य क्षमता, इंटेलिजेंस नेटवर्क, एयर डिफेंस सिस्टम और परमाणु प्रतिरोध अमेरिका प्रदान करता है, उसकी बराबरी फिलहाल कोई यूरोपीय देश नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी माना कि पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय देशों ने अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि संकट की घड़ी में अमेरिका की भूमिका निर्णायक रहती है। नाटो प्रमुख ने आगाह किया कि अगर ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी कमजोर हुई तो इसका सीधा फायदा रूस जैसे देशों को मिलेगा, जो यूरोप की एकता और सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं। उनके बयान को अमेरिका में होने वाले आगामी चुनावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि वहां “अमेरिका फर्स्ट” जैसी नीतियों पर फिर से बहस तेज हो रही है। यूरोपीय देशों में भी यह चर्चा चल रही है कि क्या उन्हें भविष्य में अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए, लेकिन नाटो चीफ के अनुसार यह लक्ष्य लंबी अवधि में ही संभव है। उन्होंने कहा कि यूरोप को अपनी रक्षा क्षमताएं जरूर बढ़ानी चाहिए, लेकिन अमेरिका के साथ गठबंधन ही नाटो की असली ताकत है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान यूरोपीय नेताओं के लिए एक चेतावनी भी है कि वे सिर्फ राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित न रहें, बल्कि रक्षा निवेश, सैन्य सहयोग और सामूहिक रणनीति पर ठोस कदम उठाएं। कुल मिलाकर, नाटो प्रमुख की यह दो टूक टिप्पणी यह दर्शाती है कि वैश्विक असुरक्षा के इस दौर में अमेरिका और यूरोप की साझेदारी न सिर्फ जरूरी है, बल्कि आने वाले वर्षों में और भी महत्वपूर्ण होने वाली है।



