
लोकसभा में वंदे मातरम पर हुई चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों के कारण खासा चर्चा में रहा। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि देश की आज़ादी के आंदोलन में वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक रहा है। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने वंदे मातरम का विरोध किया था और दुर्भाग्यवश पंडित जवाहरलाल नेहरू उस विरोध से सहमत हो गए। पीएम मोदी के इस बयान के बाद सदन में सत्ता पक्ष की ओर से जोरदार समर्थन देखा गया, जबकि विपक्ष ने इस पर आपत्ति जताई। प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम को लेकर विवाद स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही राजनीतिक स्वार्थों से जुड़ता रहा है, जबकि यह गीत देश को एकजुट करने की ताकत रखता है। उन्होंने बताया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम ने क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों और आम जनता में देशभक्ति की भावना को जागृत किया और यही कारण है कि इसे राष्ट्रीय आंदोलन का प्रेरणा स्रोत माना गया। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि आज़ादी के बाद भी कुछ लोगों ने राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर संकीर्ण राजनीति की, जिससे देश की एकता को ठेस पहुंची। अपने भाषण में उन्होंने कांग्रेस पर परोक्ष रूप से हमला करते हुए कहा कि जिन नेताओं को देश को जोड़ना चाहिए था, उन्होंने राजनीतिक समीकरणों के चलते ऐसे मुद्दों पर समझौते किए, जिनसे राष्ट्रभाव कमजोर पड़ा। प्रधानमंत्री ने आगे जोर दिया कि आज का भारत अपने इतिहास को पूरे गौरव के साथ स्वीकार करने और उससे सीख लेने के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम जैसे प्रतीक किसी दल या विचारधारा के नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की साझा विरासत हैं। पीएम मोदी ने युवाओं से आह्वान किया कि वे देश के इतिहास को समग्र दृष्टि से समझें, न कि अधूरी या विकृत व्याख्याओं के आधार पर। अंत में उन्होंने कहा कि संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को मजबूती देने का स्थान भी है और ऐसे विषयों पर खुली चर्चा लोकतंत्र को और सशक्त बनाती है।



