
ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई के नेतृत्व में भारत और ईरान के रिश्तों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन कूटनीतिक संवाद कभी पूरी तरह रुका नहीं। भारत की ओर से अलग-अलग समय पर अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसे तीन प्रधानमंत्रियों ने ईरान के साथ संबंधों को नए आयाम देने की कोशिश की। यह यात्रा सिर्फ औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं रही, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और सामरिक सहयोग जैसे बड़े मुद्दों पर केंद्रित रही है।
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत-ईरान संबंधों को रणनीतिक दृष्टि से मजबूत करने की नींव पड़ी। उस दौर में ऊर्जा सहयोग और मध्य एशिया तक पहुंच के विकल्पों पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। मनमोहन सिंह के समय में यह सहयोग और संस्थागत हुआ। गैस पाइपलाइन परियोजनाओं और व्यापार बढ़ाने पर बातचीत तेज हुई, हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों ने कई योजनाओं की गति को प्रभावित किया।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत-ईरान संबंधों ने एक नया व्यावहारिक मोड़ लिया। चाबहार पोर्ट के विकास ने भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक बिना पाकिस्तान के रास्ते के पहुंच का विकल्प दिया। इस परियोजना को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की दृष्टि से ऐतिहासिक माना गया। अमेरिका-ईरान तनाव और प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने संतुलित कूटनीति अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी।
खामनेई के नेतृत्व में ईरान ने भी भारत को एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखा है। सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्ते, जो हजारों साल पुराने हैं, आधुनिक कूटनीति में भी झलकते हैं। तेल आयात, फार्मास्युटिकल व्यापार और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सहयोग दोनों देशों को जोड़ता है।
तीन प्रधानमंत्रियों और एक सुप्रीम लीडर के बीच यह कूटनीतिक यात्रा इस बात का उदाहरण है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भी संवाद और सहयोग की राह निकाली जा सकती है। भारत और ईरान के संबंध भविष्य में भी क्षेत्रीय संतुलन और आर्थिक साझेदारी के लिहाज से अहम बने रहेंगे।



