
मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का कारण बन गया है। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है या बड़े युद्ध का रूप लेता है, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ना तय माना जा रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए इस तरह के किसी भी भू-राजनीतिक संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों पर पड़ सकता है।
- कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा: युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं।
- LPG सिलेंडर पर असर: भारत अपनी रसोई गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है।
- सप्लाई रूट पर खतरा: मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल अक्सर होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। युद्ध की स्थिति में इस मार्ग पर जोखिम बढ़ सकता है।
- रुपये पर दबाव: तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
- महंगाई बढ़ने की आशंका: पेट्रोल-डीजल और गैस महंगी होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है, जिसका असर खाने-पीने की चीजों सहित कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।
- भारत की ऊर्जा रणनीति: भारत पहले से ही अलग-अलग देशों से तेल खरीदकर जोखिम कम करने की कोशिश कर रहा है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो।
- सरकार के पास बफर: भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी हैं, जिनका इस्तेमाल संकट की स्थिति में किया जा सकता है।
- सब्सिडी का विकल्प: अगर कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं तो सरकार एलपीजी या ईंधन पर राहत देने के लिए सब्सिडी जैसे कदम उठा सकती है।
- शिपिंग और बीमा लागत: युद्ध की स्थिति में समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने से तेल ढुलाई और बीमा की लागत भी बढ़ जाती है।
- दीर्घकालिक प्रभाव: अगर संघर्ष लंबा चलता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हो सकता है और भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों में और विविधता लानी पड़ सकती है।
कुल मिलाकर, ईरान-इजरायल तनाव का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर राहत के कदम उठाए जा सकते हैं।



