
मिडिल ईस्ट की राजनीति एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गई है। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जिस रणनीति को अपनाया, उसे कई विश्लेषक “वेनेजुएला मॉडल” के रूप में देख रहे थे। इस मॉडल का मतलब है कि आर्थिक प्रतिबंधों, कूटनीतिक दबाव और आंतरिक असंतोष के जरिए किसी सरकार को कमजोर करना और सत्ता परिवर्तन की स्थिति पैदा करना। हालांकि शुरुआती संकेतों से ऐसा लगा कि अमेरिका को कुछ हद तक बढ़त मिल रही है, लेकिन समय के साथ हालात उलटते दिखाई दे रहे हैं और यह रणनीति ईरान में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई है।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और वहां सरकार के खिलाफ जन असंतोष बढ़ाना था। अमेरिका को उम्मीद थी कि जैसे वेनेजुएला में दबाव बनाकर सत्ता पर असर डालने की कोशिश की गई थी, उसी तरह ईरान में भी सरकार पर दबाव बढ़ेगा और राजनीतिक अस्थिरता पैदा होगी। लेकिन ईरान की राजनीतिक संरचना, क्षेत्रीय प्रभाव और आंतरिक शक्ति संतुलन ने इस अनुमान को काफी हद तक गलत साबित कर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की स्थिति वेनेजुएला से बिल्कुल अलग है। ईरान के पास मजबूत सैन्य ढांचा, क्षेत्रीय सहयोगी और वैचारिक समर्थन का बड़ा नेटवर्क है। इसके अलावा ईरान ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद अपने आर्थिक और कूटनीतिक विकल्पों को बढ़ाने की कोशिश की है। चीन, रूस और कुछ एशियाई देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर उसने अमेरिकी दबाव को संतुलित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि अमेरिका की रणनीति का असर सीमित ही दिखाई दे रहा है।
दूसरी ओर, अमेरिका को अब कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव, तेल बाजार में अस्थिरता और क्षेत्रीय देशों की बदलती रणनीतियां वॉशिंगटन के लिए नई मुश्किलें पैदा कर रही हैं। ईरान के सहयोगी समूहों की सक्रियता भी अमेरिकी हितों के लिए चुनौती बनती जा रही है। इससे साफ है कि सिर्फ आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए किसी मजबूत और जटिल राजनीतिक व्यवस्था को बदलना आसान नहीं होता।
कुल मिलाकर, ईरान के मामले में “वेनेजुएला मॉडल” की सीमाएं साफ दिखाई दे रही हैं। शुरुआती बढ़त के बावजूद अमेरिका को अब रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर नई सोच की जरूरत महसूस हो रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति को समझे बिना बनाई गई रणनीति लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन का अनुमान ईरान के मामले में पूरी तरह सही साबित नहीं हो पाया।



