वंदे मातरम’ का इतिहास: जब एक तुगलकी फरमान बना राष्ट्रजागरण की चिंगारी

वंदे मातरम” — ये सिर्फ दो शब्द नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी की आत्मा का प्रतीक हैं। आज से करीब 150 साल पहले, जब अंग्रेजी हुकूमत भारत पर अपने फरमान थोप रही थी, तब बंगाल के साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना की थी। उस समय ब्रिटिश शासन ने भारतीयों पर कई तुगलकी फरमान जारी किए थे, जिनमें धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर भी पाबंदी लगाई गई थी। इसी माहौल में “वंदे मातरम” की आवाज़ एक क्रांति की पुकार बनकर गूंजी।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में ‘आनंदमठ’ उपन्यास के लिए इस गीत को लिखा था। उपन्यास में यह गीत मातृभूमि की आराधना के रूप में गाया गया था। यह वह दौर था जब ब्रिटिश शासन ने भारतीयों की राष्ट्रीय चेतना को कुचलने की कोशिश की थी। कहा जाता है कि “वंदे मातरम” के शब्दों ने भारतीयों में एकजुटता और आत्मबल का संचार किया। यही वजह थी कि अंग्रेजों ने इस गीत पर प्रतिबंध तक लगाने की कोशिश की, क्योंकि यह उनके खिलाफ एक आंदोलन की भाषा बन चुका था।
1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन में “वंदे मातरम” को जन-आंदोलन का नारा बना दिया गया। हर सभा, हर जुलूस, हर प्रदर्शन में यही गीत भारतमाता के जयघोष की तरह गूंजता था। 1947 में आजादी मिलने के बाद इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया, जबकि “जन गण मन” को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया।
इस गीत की खूबसूरती इसकी भाषा और भाव में है — “माँ” के रूप में अपनी धरती के प्रति प्रेम, समर्पण और बलिदान की भावना। इसमें केवल धार्मिक या राजनीतिक अर्थ नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीयता का दर्शन है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जब इसे लिखा, तब शायद उन्हें भी नहीं पता था कि यह गीत आने वाली पीढ़ियों के दिलों में देशभक्ति की ज्योति जलाए रखेगा।
आज, डेढ़ सदी बाद भी “वंदे मातरम” सुनते ही हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। यह गीत न केवल अतीत की गाथा है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा भी — जो याद दिलाता है कि मातृभूमि के सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं।



