बचपन की दोस्ती की यादें: जब बिना बुलाए घर पहुंचना और घंटों बातें करना आम था

एक दौर था जब दोस्ती के लिए न फोन की जरूरत होती थी, न मैसेज का इंतजार। बस मन किया और दोस्त के घर पहुंच गए। दरवाजे पर आवाज लगाई और कुछ ही देर में खेल, हंसी-मजाक और लंबी-लंबी बातें शुरू हो जाती थीं।
बचपन की दोस्ती में कोई मतलब नहीं होता था। न मिलने का हिसाब रखा जाता था और न ही रिश्तों को निभाने के लिए खास कोशिश करनी पड़ती थी। साथ बैठना, छोटी-छोटी बातों पर हंसना और बिना वजह घंटों समय बिताना ही सबसे बड़ी खुशी होती थी।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में वही बेफिक्री और अपनापन कम महसूस होता है। अब मिलने के लिए समय तय करना पड़ता है, लेकिन बचपन में दोस्ती अपने आप चलती थी।
वो गलियों में खेलना, दोस्तों के घर अचानक पहुंच जाना, साथ बैठकर सपने देखना और छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाना जिंदगी के सबसे खूबसूरत हिस्सों में से एक था।
बचपन की वो बिना फिल्टर वाली दोस्ती आज भी यादों में जिंदा है। शायद यही वजह है कि पुराने दोस्तों का नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और दिल फिर उसी मासूम दौर में लौट जाना चाहता है।



