
मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर दुनिया की तेल आपूर्ति पर पड़ता है, क्योंकि वैश्विक ऊर्जा बाजार का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है। भारत और चीन, दोनों ही एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रहते हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल इंपोर्टर माना जाता है, जबकि भारत भी शीर्ष आयातकों में शामिल है। अगर बात घरेलू तेल भंडार की करें तो चीन के पास भारत की तुलना में अधिक सिद्ध (Proven) तेल भंडार हैं, लेकिन उसकी खपत भी बेहद ज्यादा है। भारत के पास सीमित घरेलू उत्पादन है, जिसके कारण उसे अपनी जरूरत का करीब 80-85 प्रतिशत तेल आयात करना पड़ता है। चीन भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, लेकिन उसने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) बनाने में भारत से पहले और बड़े स्तर पर निवेश किया है। मिडिल ईस्ट के देशों जैसे सऊदी अरब, ईरान और इराक से दोनों देशों के मजबूत ऊर्जा संबंध हैं। चीन ने जहां दीर्घकालिक तेल समझौते और निवेश के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है, वहीं भारत ने भी हाल के वर्षों में आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। ऐसे में अगर मिडिल ईस्ट में जंग लंबी खिंचती है तो तेल की कीमतों में उछाल से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन बड़े रणनीतिक भंडार और वैश्विक निवेश नेटवर्क के कारण चीन अल्पकालिक झटकों को संभालने की बेहतर स्थिति में दिखता है, जबकि भारत को संतुलित कूटनीति और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से आगे बढ़ना होगा।



