Supreme Court: ट्रायल जज से जमानत सलाह पर मांगी सफाई

यह मामला पश्चिम बंगाल के एक अंडरट्रायल आरोपी अमित घोष की जमानत याचिका से जुड़ा है, जो करीब पांच साल से जेल में है। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर कार्यवाही पूरी करने और इसकी रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक तय अवधि में ट्रायल पूरा नहीं हो सका। इसके बाद उत्तर 24 परगना के बारासात स्थित तीसरी अदालत के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर ट्रायल पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा।
इस पत्र के आखिरी दो पैराग्राफ में जमानत से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट को कब जमानत देनी चाहिए और कब नहीं, इस संबंध में टिप्पणी की गई थी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पीठासीन अधिकारी का काम सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह देना नहीं है कि उसे कब जमानत देनी चाहिए या नहीं देनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पत्र के अंतिम हिस्से पर असहमति जताई और रजिस्ट्री को संबंधित ट्रायल जज से उचित स्पष्टीकरण लेने का निर्देश दिया। अदालत की यह टिप्पणी 28 सितंबर 2026 के आदेश में दर्ज हुई।
मामले की पृष्ठभूमि में ट्रायल में हुई देरी भी महत्वपूर्ण है। हाई कोर्ट ने पहले अभियोजन के 12 और गवाहों के बयान दर्ज किए जाने की उम्मीद जताई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मई के आदेश के समय तक इन गवाहों में से किसी की भी गवाही दर्ज नहीं हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल पूरा करने के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की थी।



