Bach Baras 2026: बछ बारस कब है, पूजा विधि और इस दिन दूध-दही क्यों नहीं खाते?

बछ बारस को गोवत्स द्वादशी और नंदिनी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व गाय और उसके बछड़े की पूजा तथा संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना से जुड़ा है। 2026 की तारीख को लेकर अलग-अलग पंचांग परंपराओं में अंतर दिखाई दे रहा है—कुछ स्रोत इसे 8 सितंबर बताते हैं, जबकि अन्य उत्तर भारतीय पंचांग इसे 7 सितंबर बताते हैं।
बछ बारस 2026 कब है?
बछ बारस यानी गोवत्स द्वादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि से जुड़ा पर्व है। आपके दिए गए लेख के अनुसार 2026 में इसे 8 सितंबर को मनाया जाएगा। हालांकि अन्य प्रकाशित पंचांग गणनाओं में उत्तर भारत के लिए 7 सितंबर की तारीख भी दी गई है। इसलिए स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार व्रत की तारीख तय करना उचित रहेगा।
बछ बारस का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन गौ माता और उनके बछड़े की पूजा की जाती है। विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत करती हैं। कई परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण और कुल देवी-देवताओं की आराधना भी की जाती है।
बछ बारस पूजा विधि
बछ बारस के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद गाय और बछड़े को स्नान कराकर या साफ पानी से शुद्ध करके उन्हें सजाया जाता है। रोली, चंदन, फूल और अन्य पूजन सामग्री से गौ माता और बछड़े की पूजा की जाती है। दीप जलाकर धूप-नैवेद्य अर्पित करें और परिवार की सुख-समृद्धि तथा संतान की मंगलकामना करें। स्थानीय परंपरा के अनुसार कथा और आरती भी की जाती है।
पूजा में किन चीजों का इस्तेमाल करें?
पूजा के लिए रोली, चंदन, फूल, अक्षत, दीपक, धूप और फल आदि रखे जा सकते हैं। हालांकि कुछ परंपराओं में सामान्य चावल या धान का प्रयोग वर्जित माना जाता है और विशेष प्रकार के अनाज का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा के अनुसार पूजा सामग्री चुनना बेहतर है।
इस दिन दूध-दही क्यों नहीं खाते?
बछ बारस से जुड़ी धार्मिक मान्यता में गाय और उसके बछड़े के प्रति सम्मान प्रमुख है। इसी वजह से कई परंपराओं में इस दिन गाय के दूध और दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं किया जाता। दही, घी, दूध से बनी मिठाइयों आदि से भी परहेज किया जाता है। यह धार्मिक आस्था और व्रत की परंपरा है, कोई सार्वभौमिक चिकित्सकीय नियम नहीं।
बछ बारस पर क्या खा सकते हैं?
व्रत की क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार भोजन के नियम अलग हो सकते हैं। कुछ परंपराओं में गेहूं और धान से परहेज किया जाता है तथा चने की दाल, मूंग, मोठ या बाजरा जैसे अनाजों का महत्व बताया गया है। इसलिए व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपने परिवार और स्थानीय परंपरा के नियमों का पालन करना चाहिए।
बछ बारस और भगवान कृष्ण का संबंध
बछ बारस से जुड़ी मान्यता भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से भी जोड़ी जाती है। एक परंपरा के अनुसार इसी अवसर से कृष्ण के गोचारण से जुड़ी स्मृति का संबंध माना जाता है। इसलिए इस दिन गौ सेवा और गौ पूजा को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।
किन लोगों के लिए खास है यह व्रत?
यह व्रत विशेष रूप से संतान की मंगलकामना से जुड़ा माना जाता है। कई स्थानों पर पुत्रवती महिलाएं संतान की लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना से इसे रखती हैं। हालांकि इसकी परंपराएं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
बछ बारस पर क्या न करें?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन गाय और बछड़े को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए और गौ सेवा को महत्व देना चाहिए। व्रत रखने वाले लोगों को अपने निर्धारित खानपान नियमों का पालन करना चाहिए। दूध और दूध से बनी वस्तुओं से परहेज वाली परंपरा का पालन भी कई परिवारों में किया जाता है।
निष्कर्ष:
बछ बारस या गोवत्स द्वादशी गाय और बछड़े की पूजा, गौ सेवा और संतान के कल्याण की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन दूध-दही जैसी चीजों से परहेज की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। 2026 में इसकी तारीख को लेकर क्षेत्रीय पंचांगों में अंतर है, इसलिए व्रत रखने से पहले अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार सही तिथि और पूजा समय जरूर देख लें।
नोट: बछ बारस की तिथि और पूजा-विधि क्षेत्र तथा पंचांग परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। धार्मिक नियमों को अपनी स्थानीय परंपरा के अनुसार मानें।



