कांवड़ यात्रा 2026 कब से कब तक? जानें तारीख, महत्व और धार्मिक मान्यता

कांवड़ यात्रा का इतिहास भगवान शिव की भक्ति और समुद्र मंथन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं से संबंधित माना जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का प्रभाव कम करने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया था। शिवभक्त इसी श्रद्धा के साथ सावन में जल अर्पित कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
देश के कई राज्यों में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व देखने को मिलता है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और बिहार समेत कई क्षेत्रों से लाखों श्रद्धालु हर साल इस यात्रा में शामिल होते हैं। हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र स्थानों से गंगाजल लेकर भक्त अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं।
कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु कठिन नियमों का पालन करते हैं। कई भक्त नंगे पैर यात्रा करते हैं और कांवड़ को जमीन पर रखने से बचते हैं। इस दौरान सात्विक भोजन, संयम और भगवान शिव की आराधना को विशेष महत्व दिया जाता है।
सावन में शिवालयों में जलाभिषेक के लिए विशेष तैयारियां की जाती हैं। प्रशासन की ओर से भी कांवड़ मार्गों पर सुरक्षा, यातायात व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए इंतजाम किए जाते हैं।
कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और सामाजिक समरसता का बड़ा पर्व भी है। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों के लोग एक साथ भगवान शिव की भक्ति में शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं के बीच सेवा, सहयोग और भक्ति की भावना इस यात्रा को विशेष बनाती है।



