Rohini Vrat 2026: जानें रोहिणी व्रत का महत्व और भगवान श्रीकृष्ण से इसका विशेष संबंध

रोहिणी व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से उस दिन रखा जाता है जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में विराजमान होता है। रोहिणी नक्षत्र को 27 नक्षत्रों में अत्यंत शुभ और सौम्य माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। यही कारण है कि रोहिणी व्रत का सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ माना जाता है।
हिंदू ग्रंथों के अनुसार, जब भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग होता है, तब श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसी कारण रोहिणी नक्षत्र को श्रीकृष्ण का जन्म नक्षत्र कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, करुणा, नीति और धर्म का प्रतीक है। रोहिणी व्रत रखने से भक्तों को श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
रोहिणी व्रत विशेष रूप से महिलाएं संतान सुख, परिवार की खुशहाली और दांपत्य जीवन की सुख-शांति के लिए रखती हैं। इस दिन सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है और भगवान कृष्ण की विधि-विधान से पूजा की जाती है। भक्त उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करते हैं, माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में रोहिणी नक्षत्र को चंद्रमा का प्रिय नक्षत्र बताया गया है। यह नक्षत्र सौंदर्य, आकर्षण और समृद्धि का प्रतीक है। जब यह नक्षत्र आता है, तो सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ऐसे में इस दिन व्रत और पूजा करने से मानसिक शांति, पारिवारिक सौहार्द और आर्थिक उन्नति के योग बनते हैं।



