खेल-खिलाड़ी

नहीं रहे क्रिकेटर रईस मोहम्मद, पाकिस्तान क्रिकेट के सबसे ताकतवर परिवार का थे हिस्सा

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर रईस मोहम्मद नहीं रहे. रईस मोहम्मद पाकिस्तान के लिए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेल पाए थे. लेकिन घरेलू क्रिकेट में उनका बड़ा नाम था. एक अंतर्राष्ट्रीय मैच में वो बारहवें खिलाड़ी तक भी पहुंचे लेकिन प्लेइंग 11 में जगह नहीं ही बनी. बावजूद इसके रईस मोहम्मद का बड़ा रूतबा था. इसकी वजह थी उनके चार और भाई जो पाकिस्तान क्रिकेट के लिए नायाब हीरे जैसे थे. एक से बढ़कर एक. इनमें सबसे बड़ा नाम था- हनीफ मोहम्मद. पाकिस्तान क्रिकेट के महान खिलाड़ियों में शुमार. इसके अलावा मुश्ताक मोहम्मद, सादिक मोहम्मद और वजीर मोहम्मद भी पाकिस्तान के लिए क्रिकेट खेले थे. वजीर मोहम्मद तो शायद खेल प्रेमियों को न याद हों लेकिन मुश्ताक और सादिक मोहम्मद की यादें तो अभी क्रिकेट फैंस में ताजा होंगी. 2005 में मुझे इन भाईयों से मिलने का मौका मिला था. आज रईस मोहम्मद के न रहने पर इस विलक्षण परिवार के तमाम किस्से याद आ रहे हैं.

इस परिवार का पाकिस्तान क्रिकेट में क्या कद है इस बात का अंदाजा लगाना है तो बस ये जान लीजिए कि पाकिस्तान का क्रिकेट इतिहास इन भाईयों के बिना अधूरा है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पाकिस्तान की टीम ने जो पहले 100 टेस्ट मैच खेले उसमें से कोई भी मैच ऐसा नहीं था जिसमें इस परिवार के पांच भाईयों में से किसी ना किसी एक की नुमाइंदगी न रही हो. मेरे मन में भी जिज्ञासा थी, मैंने पूछ ही लिया- एक साथ इतने सारे भाई इतने बड़े मुकाम तक कैसे पहुंचे? हनीफ भाई ने जवाब दिया- “अम्मी ने खुद भी जूनागढ़ क्लब (गुजरात) में कई ट्रॉफियां जीती थीं, वो बैडमिंटन और कैरम की जबरदस्त खिलाड़ी थीं. एक रोज तो ऐसा हुआ कि वो किसी टूर्नामेंट में ट्रॉफी जीत कर लौटी थीं. घर पहुंची तो देखा हम लोग इधर उधर घूम रहे थे. उस रोज उन्होंने बड़े प्यार से अपनी ट्रॉफी दिखाते हुए कहा- ये देखो मैंने ये ट्रॉफी जीती अब तुम लोग भी जाओ और खेल की दुनिया में अपना नाम करो”. इसके बाद इन भाईयों ने जो कमाल किया उसके किस्से पाकिस्तान क्रिकेट इतिहास में दर्ज हैं. 5-6 साल पहले हनीफ मोहम्मद का भी इंतकाल हो गया था.

मोहम्मद भाइयों की दिलचस्प कहानी

मोहम्मद भाईयों की पूरी जिंदगी ही एक अफसाना है. जिसकी एक एक परतें उस रोज कराची में उनके साथ मुलाकात में खुली थीं. 30 के दशक में इन भाईयों का जन्म हुआ था. बच्चे अभी छोटे छोटे ही थे जब देश का बंटवारा हो गया. बंटवारे के बाद हालात अच्छे नहीं थे. घरवालों की तरफ से बच्चों को हिदायत दी गई थी कि घर से बाहर नहीं निकलना है. खिड़कियां खोलने तक पर मनाही थी. फिर कुछ रोज बाद जूनागढ़ के नवाब भी पाकिस्तान चले गए, तब मोहम्मद भाईयों का परिवार पाकिस्तान गया. पूरा परिवार रातों रात पाकिस्तान पहुंचा, जिससे उन्हें कोई देख ना सके. पानी के रास्ते उनका पूरा परिवार कराची पहुंचा था. सर पर छत नहीं थी. रईस मोहम्मद के अब्बा को तमाम कवायदों के बाद एक हिंदू मंदिर में पनाह मिली और फिर लंबे अरसे तक वो लो वहीं रहे. इसके बाद धीरे धीरे उनके परिवार ने कराची में अपना ठिकाना बनाया और परिवार के हालात सुधरे.

रईस भाई बताते थे कि जब हनीफ मोहम्मद पैदा हुए तो उनकी अम्मी को पूरी उम्मीद थी कि इस बार बेटी पैदा होगी. उन्होंने बेटी के हिसाब से तैयारी कर ली थी. हनीफ का बचपन इसीलिए बेटी की तरह ही रहा. अम्मी उनकी चोटी बनाती थीं, बिंदी लगाती थीं, फ्रॉक पहनाती थीं. मैंने बतौर खेल पत्रकार पाकिस्तान के चार दौरे किए हैं. कई बार कराची जाना हुआ है. लेकिन इन सभी दौरों की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है मोहम्मद भाईयों के साथ हुई वो मुलाकात. आज उसका एक किरदार चला गया.

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