Dhruv Jurel: पिता फौजी, दादा किसान… शतक के बाद ‘जय जवान जय किसान’ टैटू दिखाने की बताई वजह

भारत और श्रीलंका के बीच कोलंबो में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट में ध्रुव जुरेल ने शानदार शतक लगाकर खूब सुर्खियां बटोरीं। नाबाद 115 रन की पारी खेलने के बाद उनका सेलिब्रेशन भी उतना ही खास रहा। जुरेल ने हेलमेट उतारा, बल्ला उठाया और फिर अपनी बांह पर बना ‘जय जवान, जय किसान’ टैटू दिखाया।
शतक के बाद जुरेल ने बताया कि इस टैटू के पीछे उनके परिवार की कहानी है। उन्होंने कहा कि उनके दादा किसान थे, जबकि उनके पिता सैनिक रहे हैं। इसलिए ‘जय जवान, जय किसान’ उनके लिए महज एक मशहूर नारा नहीं, बल्कि उनकी अपनी जड़ों का हिस्सा है।
जुरेल ने साफ कहा कि वह अपनी जड़ों को भूलना नहीं चाहते। उनके मुताबिक, टैटू के जरिए वह अपने पिता और दादा को सम्मान देना चाहते थे। इसी वजह से उन्होंने शतक पूरा करने के बाद खास तौर पर अपनी बांह पर बने इस टैटू को कैमरों के सामने दिखाया।
यह पल इसलिए भी भावुक था क्योंकि जुरेल ने 177 गेंदों पर नाबाद 115 रन की पारी खेली और भारत को पहली पारी में 503/9 के विशाल स्कोर तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया। यह उनके टेस्ट करियर का दूसरा शतक था।
शतक तक पहुंचने के दौरान भी जुरेल को काफी इंतजार करना पड़ा। वह 99 रन पर पहुंचने के बाद कुछ गेंदों तक अपना शतक पूरा नहीं कर सके। आखिरकार असिथा फर्नांडो की गेंद पर सिंगल लेकर उन्होंने सेंचुरी पूरी की। इसके बाद उन्होंने अपने अंदाज में जश्न मनाया और टैटू दिखाया।
जुरेल की इस पारी में ऋषभ पंत के साथ 112 रन की साझेदारी भी हुई। पंत ने आक्रामक अंदाज में बल्लेबाजी की, जबकि जुरेल ने अपनी शैली के मुताबिक धैर्य के साथ रन बनाए। उन्होंने बताया कि पंत जैसे बल्लेबाज के साथ खेलते हुए भी वह उनकी नकल करने के बजाय अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान देते हैं।
‘जय जवान, जय किसान’ भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा लोकप्रिय बनाया गया प्रसिद्ध नारा है। जुरेल के लिए इसका अर्थ और भी व्यक्तिगत है, क्योंकि उनके परिवार में एक पीढ़ी किसान और दूसरी पीढ़ी सैनिक रही है। इसलिए कोलंबो में उनका यह सेलिब्रेशन एक क्रिकेट उपलब्धि से बढ़कर परिवार को श्रद्धांजलि बन गया।
ध्रुव जुरेल की इस पारी ने जहां भारत को टेस्ट में मजबूत स्थिति दी, वहीं उनके सेलिब्रेशन ने यह भी दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की बड़ी उपलब्धि के बीच वह अपनी पारिवारिक जड़ों को कितना महत्व देते हैं। उनके शब्दों में, ये ही उनकी जड़ें हैं और वह उन्हें भूलना नहीं चाहते।



