ठेकुआ को इन नामों से भी जाना जाता है, संस्कृत नाम जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान

भारतीय परंपराओं में कई ऐसे व्यंजन हैं जिनका जुड़ाव न सिर्फ स्वाद से बल्कि आस्था और संस्कृति से भी गहराई से होता है। ऐसा ही एक प्रसाद है ठेकुआ, जिसे विशेष रूप से छठ पूजा के अवसर पर बनाया जाता है। उत्तर भारत के बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह व्यंजन बेहद लोकप्रिय है। मगर क्या आप जानते हैं कि ठेकुआ को सिर्फ एक नाम से नहीं, बल्कि कई अन्य नामों से भी जाना जाता है? इन नामों में कुछ तो क्षेत्रीय हैं, तो कुछ इतने प्राचीन कि उनके संस्कृत अर्थ सुनकर कोई भी चौंक जाए।
बिहार और झारखंड में इसे आमतौर पर ठेकुआ या खजूरा कहा जाता है। वहीं कुछ इलाकों में इसे थेकुआ या ठेकवा नाम से भी पुकारा जाता है। यूपी के कुछ ग्रामीण हिस्सों में इसे गुरकिया या गुड़ पुआ भी कहा जाता है, क्योंकि यह गुड़ और गेहूं के आटे से बनाया जाता है। हालांकि सबसे दिलचस्प बात तब सामने आती है जब इसका संस्कृत नाम बताया जाता है। संस्कृत में ठेकुआ को “गोधूमपक” कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘गेहूं से बना मीठा पकवान’। यह नाम सुनकर कोई भी चकित रह जाए, क्योंकि यह बताता है कि यह व्यंजन कितना पुराना और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
ठेकुआ न केवल एक स्वादिष्ट व्यंजन है बल्कि यह भक्ति और पवित्रता का प्रतीक भी माना जाता है। छठ माता को अर्पित किए जाने वाले इस प्रसाद में किसी तरह की मिलावट या बाजारू सामग्री का प्रयोग नहीं किया जाता। इसे केवल घर की शुद्ध सामग्री जैसे गेहूं का आटा, गुड़ या चीनी, नारियल और घी से बनाया जाता है। जब इसे मिट्टी के चूल्हे पर देसी घी में तला जाता है, तो इसकी खुशबू पूरे माहौल को भक्तिमय बना देती है।
आज भले ही आधुनिक मिठाइयों की भरमार हो गई है, लेकिन ठेकुआ का स्थान आज भी किसी ने नहीं ले पाया है। यह सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति और आस्था की अमूल्य धरोहर है। संस्कृत में ‘गोधूमपक’ कहलाने वाला यह पारंपरिक प्रसाद हमें अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ता है, और यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।



