जून 2025 ने एक नया डरावना रिकॉर्ड बनाया है। अफ्रीका, एशिया और यूरोप के 12 देशों में यह महीना अब तक का सबसे गर्म साबित हुआ, जिससे करीब 79 करोड़ लोग हीटवेव की चपेट में आ गए हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने इस पर गहरी चिंता जताई है और कहा है कि अगर दुनिया ने अब भी जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया, तो इसके परिणाम और भी विनाशकारी होंगे।
ग्लोबल तापमान में लगातार वृद्धि, बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें और जंगलों की कटाई जैसे कारणों से दुनिया के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर चला गया। खासकर भारत, चीन, स्पेन, मिस्र, सऊदी अरब, और नाइजीरिया जैसे देशों में हालात बेहद गंभीर हो गए हैं।
UN की जलवायु रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में जून सबसे गर्म महीना बनने के साथ-साथ ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार, समुद्री सतह का बढ़ता तापमान, और बिजली की मांग में तेज उछाल जैसे प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बढ़ा तापमान सांस, दिल और मानसिक बीमारियों को तेजी से बढ़ा रहा है। वहीं, खेती, पानी की आपूर्ति और ऊर्जा उत्पादन पर भी इसका गहरा असर पड़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यह केवल एक “प्राकृतिक असामान्यता” नहीं, बल्कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि ग्लोबल टेम्परेचर में 1.5°C से अधिक की वृद्धि हुई, तो आने वाले वर्षों में हर साल ऐसा गर्मी का कहर देखने को मिल सकता है।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के अनुसार, इस जून में हीट-स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हार्ट अटैक के मामलों में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है। अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के लिए विशेष वार्ड तक बनाने पड़े।
यूरोप के कई देशों — जैसे स्पेन, फ्रांस और इटली — में रेड अलर्ट जारी किया गया, जहां दिन का तापमान 47°C तक पहुंच गया। मध्य एशिया के कुछ इलाकों में तो स्कूल बंद करने पड़े और कार्यालयों का समय सीमित करना पड़ा।
कृषि और खाद्य सुरक्षा पर भी इस गर्मी का गहरा असर पड़ा है। कई देशों में बारिश कम होने से फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे खाद्य कीमतों में उछाल आया है।
विशेष रूप से अफ्रीका और दक्षिण एशिया के किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहां सिंचाई की व्यवस्था पहले से ही कमजोर है।



