डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए बांग्लादेश, जापान समेत 14 देशों पर टैरिफ बम फोड़ दिया है। उन्होंने आयातित वस्तुओं पर 10% से 25% तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का ऐलान किया है। ट्रंप का कहना है कि ये देश “अमेरिकी उद्योग को नुकसान पहुंचा रहे हैं और असंतुलित व्यापार” में लिप्त हैं।
हालांकि इसी बयान में उन्होंने भारत को लेकर सकारात्मक रुख भी दिखाया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और भारत के बीच “ट्रेड डील की दिशा में बातचीत तेज़ हो रही है” और जल्दी ही “एक ऐतिहासिक समझौते” की उम्मीद है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे संबंधों का जिक्र करते हुए भारत को “आर्थिक भागीदार” बताया।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की ये रणनीति चीन और कुछ एशियाई देशों पर दबाव बनाने के लिए है, ताकि अमेरिका की मैन्युफैक्चरिंग और नौकरियों को प्राथमिकता दी जा सके। वहीं भारत के लिए यह एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जो पहले GSP (Generalized System of Preferences) से बाहर कर दिया गया था।
ट्रंप की नई टैरिफ नीति के तहत जिन 14 देशों को निशाना बनाया गया है, उनमें बांग्लादेश, जापान, वियतनाम, थाईलैंड, तुर्की, मैक्सिको, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश शामिल हैं। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ये देश अमेरिका में सस्ती कीमतों पर सामान भेजकर अमेरिकी उद्योगों को कमजोर कर रहे हैं। इसके जवाब में, ट्रंप ने उन पर आयात शुल्क बढ़ाने की घोषणा की है।
बांग्लादेश और वियतनाम जैसे विकासशील देशों के लिए यह फैसला बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि ये देश गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो पार्ट्स जैसे सेक्टर्स में अमेरिका के बड़े सप्लायर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इससे उनकी एक्सपोर्ट ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
दूसरी ओर, ट्रंप ने भारत को लेकर नरम रुख दिखाकर साफ संकेत दिया है कि वे भारत को एक रणनीतिक आर्थिक साझेदार के रूप में देखना चाहते हैं। अमेरिका में आने वाले चुनावों के मद्देनज़र ट्रंप की यह कूटनीतिक चाल भी मानी जा रही है, जिसमें वे चीन को पीछे छोड़ भारत को तरजीह दे रहे हैं।
ट्रंप ने यह भी कहा:
“भारत के साथ व्यापार को और मजबूत किया जाएगा। एक फेयर डील पर काम हो रहा है, जो दोनों देशों के हित में होगा।“
भारत के लिए यह बयान काफी अहम है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका भारतीय वस्तुओं जैसे टेक्सटाइल, फार्मास्युटिकल्स और आईटी सेवाओं पर किसी नए टैरिफ का बोझ नहीं डालेगा। इसके उलट, दोनों देशों के बीच ड्यूटी में रियायत और नई निवेश संधियों की संभावना बढ़ गई है।



