उत्तर प्रदेश में चल रहे स्कूल विलय विवाद को लेकर लखनऊ हाईकोर्ट में सुनवाई का आज तीसरा दिन रहा। राज्य सरकार द्वारा संचालित कम नामांकन वाले प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को एकीकृत (विलय) करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बहस पूरी हो चुकी है। अदालत की डबल बेंच ने 3 महत्वपूर्ण अपीलों पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है और संभावना है कि आज ही इसपर अंतिम निर्णय सुना दिया जाए।
सरकार ने इस योजना के तहत ऐसे स्कूलों को मिलाने का निर्णय लिया है जहां छात्रों की संख्या बेहद कम है। उद्देश्य यह बताया गया है कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग, शिक्षकों की उपयुक्त तैनाती और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सकेगा। वहीं, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह निर्णय छात्रों के हितों के खिलाफ है और इससे ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की पहुँच पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले को डबल बेंच को सौंपा था, जिसमें जस्टिस अतीक अहमद और जस्टिस ओपी शुक्ला की पीठ ने सुनवाई की। वकीलों की बहस में स्कूल दूरी, छात्र-शिक्षक अनुपात, शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार की नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों पर भी गहन चर्चा हुई।
सरकारी पक्ष ने कहा कि यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है और इससे शैक्षणिक संसाधनों का समुचित वितरण सुनिश्चित होगा। वहीं याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि बिना स्थानीय समुदाय और अभिभावकों की सहमति के ऐसे विलय को अमान्य ठहराया जाए।
अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में प्रदेश के सरकारी स्कूलों की रूपरेखा और नीति निर्धारण को प्रभावित कर सकता है। यदि कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला देती है, तो हज़ारों स्कूलों का एकीकरण तेज़ी से शुरू हो सकता है। लेकिन अगर फैसले में याचिकाकर्ताओं की दलीलें स्वीकार की गईं, तो यह सरकार की शिक्षा नीति को तगड़ा झटका हो सकता है।



