हैदराबाद में एक प्रतिष्ठित माने जाने वाले IVF क्लिनिक से जुड़ा एक चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है। पुलिस और बाल संरक्षण इकाइयों द्वारा की गई संयुक्त छापेमारी में खुलासा हुआ कि यह क्लिनिक केवल इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट तक सीमित नहीं था, बल्कि बच्चों की अवैध तस्करी के एक बड़े रैकेट का हिस्सा था। इस घोटाले ने न सिर्फ चिकित्सा क्षेत्र की साख पर सवाल उठाए हैं, बल्कि मानवता को भी शर्मसार किया है।
जांच में सामने आया कि यह क्लिनिक जरूरतमंद माता-पिता को झूठे दस्तावेज़ों के आधार पर बच्चे दिलवाता था। इसके लिए या तो महिलाओं को जबरन गर्भवती कराया जाता था या पहले से जन्म ले चुके बच्चों को अवैध रूप से गोद देने के नाम पर बेच दिया जाता था। कई मामलों में, गरीब और अशिक्षित महिलाओं को लालच देकर या धमकाकर उनका शोषण किया गया।
इस रैकेट में क्लिनिक के डॉक्टर, बिचौलिए, निजी एजेंसियां और कुछ विदेशी संपर्क भी शामिल पाए गए हैं। आरोप है कि ये बच्चे न केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तस्करी किए जा रहे थे। कुछ केस में बच्चों के फर्जी पासपोर्ट और पहचान पत्र भी बरामद हुए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस रैकेट का नेटवर्क बहुत ही संगठित और गहरा था।
पुलिस ने अभी तक इस केस में कई लोगों को गिरफ्तार किया है और कई पर केस दर्ज किया जा चुका है। जिन महिलाओं से जबरन बच्चे छीने गए, उनकी पहचान कर उन्हें मनोवैज्ञानिक और कानूनी सहायता दी जा रही है। सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जो इस पूरे नेटवर्क की तह तक जाकर दोषियों को सजा दिलवाने का प्रयास करेगा।
इस घटना ने IVF तकनीक के दुरुपयोग और मेडिकल सेक्टर में नैतिकता की कमी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर IVF तकनीक ने लाखों दंपतियों को माता-पिता बनने का सुख दिया है, वहीं दूसरी ओर इसी तकनीक का ग़लत इस्तेमाल कर बच्चों को “माल” की तरह बेचा जा रहा है।
सरकार और मेडिकल काउंसिल से यह मांग उठ रही है कि IVF क्लिनिकों के लिए सख्त नियम बनाए जाएं और नियमित निगरानी की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह के घिनौने अपराधों को रोका जा सके। यह घटना न सिर्फ कानून व्यवस्था बल्कि सामाजिक चेतना के लिए भी एक बड़ा सबक है।



