इक्कीस मूवी रिव्यू: शहादत, साहस और सम्मान की कहानी, धर्मेंद्र का इमोशनल अंदाज़

फिल्म ‘इक्कीस’ (Ikkis) भारतीय सेना के महान वीर सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की सच्ची और प्रेरणादायक कहानी को बड़े पर्दे पर जीवंत करती है। 1971 के भारत–पाक युद्ध में मात्र 21 वर्ष की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले अरुण खेत्रपाल की जांबाज़ी को यह फिल्म पूरे सम्मान और संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है। फिल्म की कहानी देशभक्ति के शोर से नहीं, बल्कि सैनिक के कर्तव्य, साहस और आत्मबल से दर्शकों के दिल को छूती है।
कहानी की शुरुआत एक सामान्य युवा अरुण खेत्रपाल से होती है, जो सेना में भर्ती होकर देश सेवा का सपना देखता है। ट्रेनिंग से लेकर युद्ध के मैदान तक का सफर बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है। युद्ध के दृश्य वास्तविक लगते हैं और टैंक रेजीमेंट की रणनीति, तनाव और जोखिम को बारीकी से प्रस्तुत किया गया है। खास बात यह है कि फिल्म केवल युद्ध नहीं दिखाती, बल्कि एक बेटे, एक साथी और एक सच्चे सैनिक के भावनात्मक पहलुओं को भी उजागर करती है।
फिल्म में धर्मेंद्र की मौजूदगी कहानी को और भी मजबूत बनाती है। उनका किरदार सीमित होने के बावजूद गहरा असर छोड़ता है। धर्मेंद्र का भावुक अभिनय दर्शकों की आंखें नम कर देता है और उनके संवाद सीधे दिल तक पहुंचते हैं। वहीं अरुण खेत्रपाल की भूमिका निभाने वाले अभिनेता ने मासूमियत, साहस और दृढ़ संकल्प को संतुलित तरीके से पर्दे पर उतारा है।
निर्देशन की बात करें तो फिल्म की गति संतुलित है और कहीं भी कहानी भटकती नहीं है। बैकग्राउंड म्यूजिक देशभक्ति की भावना को उभारता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा भारी नहीं लगता। सिनेमैटोग्राफी युद्ध के मैदान की भयावहता और सैनिकों के जज्बे को बखूबी दर्शाती है।
कुल मिलाकर, ‘इक्कीस’ सिर्फ एक युद्ध फिल्म नहीं, बल्कि बलिदान, सम्मान और देश के लिए जीने-मरने के जज्बे की कहानी है। यह फिल्म युवाओं को प्रेरित करती है और शहीद अरुण खेत्रपाल को सच्ची श्रद्धांजलि देती है। देशभक्ति और सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों के शौकीनों के लिए यह जरूर देखने लायक है।



