
उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने नया DMO फॉर्मूला सामने रखकर सियासी हलचल तेज कर दी है। यह रणनीति सीधे तौर पर अखिलेश यादव के PDA मॉडल को चुनौती देती नजर आ रही है। सवाल यह है कि क्या मायावती का सामाजिक समीकरण अखिलेश की राजनीति पर भारी पड़ेगा या फिर PDA ही विपक्ष की मजबूत धुरी बना रहेगा। आने वाले महीनों में दोनों दलों की रणनीति प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगी।
बसपा के DMO फॉर्मूले को दलित, मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग को साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मायावती एक बार फिर अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट करने के साथ नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने में जुटी हैं। पार्टी संगठन को ज़मीनी स्तर पर सक्रिय करने और कैडर को मजबूत करने पर खास जोर दिया जा रहा है।
वहीं समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का PDA मॉडल पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के व्यापक गठजोड़ पर आधारित है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद PDA को सियासी पहचान मिली, जिससे अखिलेश का आत्मविश्वास बढ़ा है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में यह मॉडल कितना असरदार साबित होगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बसपा का DMO फॉर्मूला ज़मीन पर प्रभावी ढंग से उतरता है, तो यह विपक्षी वोटों में सेंध लगा सकता है। इससे सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को हो सकता है, जबकि सत्ता पक्ष को अप्रत्यक्ष फायदा मिलने की संभावना भी जताई जा रही है।
आने वाले समय में मायावती और अखिलेश दोनों की रणनीतियां, गठबंधन की संभावनाएं और जमीनी मुद्दों पर पकड़ तय करेगी कि 2027 में उत्तर प्रदेश की सियासत किस करवट बैठेगी। फिलहाल DMO बनाम PDA की सियासी जंग ने चुनावी माहौल को गर्मा दिया है।



