
हवाई यात्राएं पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। सस्ते टिकट, नए एयरपोर्ट और बढ़ते रूट्स ने आम लोगों के लिए उड़ान भरना आसान बना दिया है। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यही रफ्तार आने वाले समय में बड़ी समस्या बन सकती है। एविएशन सेक्टर से जुड़े जानकारों ने चेतावनी दी है कि यदि एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार समय पर नहीं हुआ, तो साल 2030 तक फ्लाइट देरी की समस्या विकराल रूप ले सकती है। स्थिति ऐसी बन सकती है जिसे लोग ‘आसमान में चक्का जाम’ कहने लगें।
विशेषज्ञ बताते हैं कि उड़ानों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन रनवे, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम और पार्किंग बे जैसी सुविधाएं उसी अनुपात में विकसित नहीं हो पा रही हैं। बड़े शहरों के एयरपोर्ट पहले से ही अपनी क्षमता के करीब काम कर रहे हैं। पीक आवर्स में विमानों को लैंडिंग की अनुमति के लिए हवा में चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे ईंधन की खपत बढ़ती है और यात्रियों को लंबा इंतजार करना पड़ता है।
इसके अलावा मौसम में बदलाव, तकनीकी बाधाएं और सुरक्षा जांच की सख्ती भी देरी की बड़ी वजह बनती जा रही हैं। एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर अभी से सैटेलाइट आधारित नेविगेशन, नए रनवे, ज्यादा एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और आधुनिक प्रबंधन प्रणाली पर निवेश नहीं बढ़ाया गया, तो भविष्य में हालात संभालना मुश्किल हो सकता है। यात्रियों की संख्या में अनुमानित बढ़ोतरी मौजूदा व्यवस्था पर भारी दबाव डाल सकती है।
हालांकि सरकारें और विमानन प्राधिकरण नए एयरपोर्ट बनाने और मौजूदा सुविधाओं को अपग्रेड करने की दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन मांग की रफ्तार उससे कहीं ज्यादा तेज है। यात्रियों के लिए इसका मतलब हो सकता है कि उन्हें एयरपोर्ट पर ज्यादा समय लेकर चलना पड़े, कनेक्टिंग फ्लाइट्स मिस होने का खतरा बढ़े और यात्रा की लागत भी ऊपर जाए।
आने वाले वर्षों में एविएशन सेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि बढ़ती मांग और सीमित संसाधनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक फ्लाइट डिले आम बात बन सकती है और हवाई यात्रा का अनुभव पहले जैसा सहज नहीं रह जाएगा।



