लखनऊ में मोहन भागवत का बड़ा बयान: वैश्वीकरण खतरनाक, विश्व गुरु बनने के लिए सत्य के पीछे शक्ति जरूरी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में वैश्वीकरण के मौजूदा स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अंधाधुंध वैश्वीकरण दुनिया के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब वैश्वीकरण केवल आर्थिक लाभ, बाजार विस्तार और उपभोक्तावाद तक सीमित रह जाता है, तब वह समाजों की सांस्कृतिक पहचान, आत्मनिर्भरता और नैतिक मूल्यों को कमजोर कर देता है। भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी जड़ों को छोड़ दें। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि भारत को फिर से ‘विश्व गुरु’ बनना है तो केवल आदर्शों और उपदेशों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सत्य के पीछे शक्ति भी खड़ी करनी होगी। उनके अनुसार, सत्य तभी प्रभावी होता है जब उसके समर्थन में सामर्थ्य, आत्मविश्वास और संगठन की ताकत हो।
उन्होंने कहा कि भारत के पास आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और ज्ञान की समृद्ध परंपरा है, जो उसे वैश्विक स्तर पर मार्गदर्शक बना सकती है। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि देश आर्थिक, तकनीकी और सामरिक रूप से भी सशक्त बने। भागवत ने युवाओं से आह्वान किया कि वे राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं और केवल आलोचना के बजाय सकारात्मक योगदान दें। उन्होंने यह भी कहा कि आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि मानसिकता का परिवर्तन है। जब तक समाज आत्मगौरव और अनुशासन को नहीं अपनाएगा, तब तक वैश्विक मंच पर नेतृत्व संभव नहीं होगा। अपने संबोधन में उन्होंने सामाजिक समरसता, परिवार व्यवस्था और भारतीय जीवन मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि भारत को अपनी पहचान बनाए रखते हुए आधुनिकता को अपनाना होगा, तभी वह संतुलित और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति बन सकेगा।



