
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक नई क्रांति का शंखनाद हो चुका है। स्टार्टअप इकोसिस्टम, आईटी सर्विस सेक्टर और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर देश ने वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। NASSCOM की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत दुनिया के सबसे बड़े AI टैलेंट पूल में से एक है। हर साल लाखों इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स और डेटा साइंस प्रोफेशनल्स इस क्षेत्र में कदम रख रहे हैं। भारतीय डेवलपर्स की भागीदारी ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म्स और ग्लोबल टेक कंपनियों में लगातार बढ़ रही है।
इसके बावजूद सवाल उठता है कि जब टैलेंट में हम ‘बाहुबली’ हैं, तो निवेश के मामले में क्यों पीछे हैं? अमेरिका और चीन जैसे देशों में AI स्टार्टअप्स को भारी-भरकम वेंचर कैपिटल फंडिंग मिलती है। OpenAI, Google और Microsoft जैसी कंपनियां अरबों डॉलर का निवेश रिसर्च और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर कर रही हैं। भारत में भी निवेश बढ़ा है, लेकिन वह अभी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।
एक बड़ी चुनौती हाई-एंड कंप्यूटिंग संसाधनों और चिप निर्माण से जुड़ी है। एडवांस्ड GPU और AI चिप्स की उपलब्धता सीमित और महंगी है, जिससे रिसर्च और प्रोडक्ट डेवलपमेंट की रफ्तार प्रभावित होती है। हालांकि सरकार ने ‘इंडियाAI मिशन’ और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन इन पहलों को जमीन पर असर दिखाने में समय लगेगा।
दूसरी ओर, भारतीय स्टार्टअप्स का फोकस अभी भी सर्विस-आधारित मॉडल पर अधिक है, जबकि डीप-टेक रिसर्च और प्रोडक्ट इनोवेशन में जोखिम ज्यादा और रिटर्न अनिश्चित होता है। निवेशक अक्सर सुरक्षित और त्वरित लाभ वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि कई प्रतिभाशाली भारतीय AI शोधकर्ता विदेशों का रुख कर लेते हैं, जहां बेहतर फंडिंग और रिसर्च इकोसिस्टम उपलब्ध है।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। डिजिटल इंडिया, UPI, आधार और बड़े डेटा सेट्स जैसे संसाधन भारत को AI के उपयोग-आधारित समाधानों में बढ़त दे सकते हैं। हेल्थकेयर, एग्रीटेक, एजुकेशन और गवर्नेंस में AI के व्यापक प्रयोग की संभावनाएं हैं। यदि सरकार, उद्योग और अकादमिक संस्थान मिलकर दीर्घकालिक निवेश, रिसर्च ग्रांट और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, तो भारत न केवल टैलेंट में बल्कि निवेश और इनोवेशन में भी वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है।



