
अजमेर में हिंदुओं के चादर चढ़ाने को लेकर बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री के हालिया बयान ने धार्मिक और सामाजिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि उन्हें अजमेर में हिंदुओं द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा पर आपत्ति है और समाज को अपनी धार्मिक पहचान और परंपराओं के प्रति सजग रहना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में आस्था, परंपरा और सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर विभिन्न मंचों पर चर्चा चल रही है। गौरतलब है कि अजमेर शरीफ दरगाह सदियों से हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानी जाती रही है, जहां अलग-अलग धर्मों के लोग ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं। यही कारण है कि शास्त्री के बयान को कुछ लोग धार्मिक पहचान के संदर्भ में देख रहे हैं, तो कुछ इसे सामाजिक समरसता पर टिप्पणी मान रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि वे केवल सनातन परंपराओं के संरक्षण की बात कर रहे हैं, जबकि आलोचकों का मत है कि इस तरह के बयान से सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है। राजनीतिक गलियारों में भी इस बयान को लेकर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं और विभिन्न दल इसे अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। अजमेर शरीफ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वहां की गंगा-जमुनी तहजीब को देखते हुए यह मुद्दा केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की विविधता और सह-अस्तित्व की भावना से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है और समाज में आपसी संवाद के जरिए किस तरह संतुलन स्थापित किया जाता है।



