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तेल भंडार की दौड़: भारत, जापान और चीन के पास कितना क्रूड ऑयल रिजर्व, युद्ध की स्थिति में किसका साथ देगा स्टॉक

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के बीच दुनिया के कई देशों की नजर अब अपने तेल भंडार पर टिकी हुई है। कच्चे तेल की सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है, इसलिए किसी भी सैन्य टकराव का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। ऐसे समय में यह सवाल बेहद अहम हो जाता है कि एशिया की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाएं—भारत, जापान और चीन—के पास कितना तेल स्टॉक मौजूद है और अगर सप्लाई बाधित होती है तो ये देश कितने समय तक अपने कामकाज को सामान्य रूप से चला सकते हैं।

भारत की बात करें तो देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) और रिफाइनरियों में मौजूद स्टॉक को मिलाकर लगभग 70 से 75 दिनों की जरूरत के बराबर तेल उपलब्ध माना जाता है। भारत ने आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में रणनीतिक तेल भंडारण सुविधाएं बनाई हैं, जिनका उद्देश्य आपातकालीन स्थितियों में देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि भारत अभी भी अपनी कुल जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए लंबे समय तक सप्लाई बाधित होने की स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

दूसरी ओर जापान ऊर्जा सुरक्षा के मामले में काफी मजबूत स्थिति में माना जाता है। जापान के पास सरकारी और निजी कंपनियों के भंडार को मिलाकर लगभग 160 से 200 दिनों तक चलने वाला तेल स्टॉक मौजूद है। जापान सरकार ने दशकों पहले ही ऊर्जा संकट से सीख लेते हुए बड़े पैमाने पर तेल भंडारण की रणनीति अपनाई थी, जिससे वह वैश्विक आपूर्ति संकट के दौरान भी अपने उद्योग और परिवहन व्यवस्था को स्थिर रख सके।

चीन की स्थिति भी अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है। दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल आयातक होने के बावजूद चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर रणनीतिक तेल भंडार तैयार किया है। अनुमान के मुताबिक चीन के पास करीब 90 से 100 दिनों की जरूरत के बराबर कच्चा तेल स्टॉक मौजूद है। इसके अलावा चीन लगातार अपने भंडारण ढांचे का विस्तार कर रहा है ताकि वैश्विक संकट की स्थिति में आर्थिक गतिविधियों पर असर कम से कम पड़े।

कुल मिलाकर देखा जाए तो मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक युद्ध जैसी स्थिति बनने पर सबसे ज्यादा दबाव उन देशों पर पड़ेगा जो तेल आयात पर निर्भर हैं। हालांकि रणनीतिक भंडार के कारण भारत, जापान और चीन जैसे देश कुछ महीनों तक स्थिति को संभाल सकते हैं, लेकिन अगर संकट लंबा चला तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

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