
1865 में भारत का शेयर बाजार एक बड़े संकट से गुजरा, जिसे आज भी वित्तीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उस समय ‘सफेद सोना’, यानी कॉटन, की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव ने निवेशकों की नींद उड़ा दी थी। अमेरिकी गृहयुद्ध के चलते कॉटन की आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे भारत में कॉटन ट्रेड पर बड़ा असर पड़ा और शेयर बाजार अचानक गिर गया।
अमेरिका में गृहयुद्ध के दौरान दक्षिणी राज्यों से कॉटन की निर्यात सीमित हो गई, जो भारत के कॉटन व्यापारियों और निवेशकों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। यूरोप और ब्रिटेन की मार्केट भी प्रभावित हुई, क्योंकि भारत से निर्यात होने वाली कॉटन की मांग में अचानक कमी आई।
इस वित्तीय झटके के दौरान कई निवेशकों ने भारी नुकसान उठाया। शेयर बाजार में पैनिक सेलिंग का माहौल बन गया, और लोगों ने अपने निवेश को सुरक्षित रखने के लिए तुरंत शेयर बेच दिए। यह घटना साबित करती है कि वैश्विक घटनाओं का प्रभाव स्थानीय बाजारों पर कितनी तेजी से पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 1865 का यह क्रैश न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि निवेशकों की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं के मामले में भी एक अध्ययन का विषय है। इसके बाद भारत में शेयर बाजार के नियमों और निगरानी में सुधार की जरूरत महसूस की गई।



