
अमेरिका के अत्याधुनिक F-35 Lightning II लड़ाकू विमान को लेकर हाल के दिनों में कई रिपोर्टें सामने आई हैं, जिनमें इसकी परिचालन क्षमता और रखरखाव से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है। अमेरिकी सरकारी जवाबदेही कार्यालय (GAO) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में F-35 बेड़े का “फुल मिशन कैपेबल” रेट करीब 25% तक गिर गया, यानी किसी भी समय केवल एक चौथाई विमान ही अपने सभी निर्धारित मिशनों को पूरा करने की स्थिति में थे। इसके पीछे स्पेयर पार्ट्स की कमी, सॉफ्टवेयर अपडेट में देरी और रखरखाव संबंधी समस्याओं को प्रमुख कारण बताया गया है।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि F-35 “उड़ ही नहीं रहे” या पूरी तरह “कबाड़” साबित हो गए हैं। F-35 दुनिया के कई देशों की वायु सेनाओं में सक्रिय सेवा में हैं और नियमित उड़ानें तथा सैन्य अभियान भी संचालित कर रहे हैं। समस्या मुख्य रूप से उनकी उपलब्धता, रखरखाव लागत और मिशन-तैयारी दरों से जुड़ी है, न कि विमान के पूरी तरह निष्क्रिय हो जाने से।
रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि F-35 कार्यक्रम को सॉफ्टवेयर अपग्रेड, नए सिस्टम एकीकरण और आपूर्ति श्रृंखला संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग इन समस्याओं को दूर करने के लिए अरबों डॉलर की नई योजना पर काम कर रहा है, ताकि आने वाले वर्षों में विमानों की उपलब्धता और युद्धक क्षमता को बेहतर बनाया जा सके।
भारत के संदर्भ में देखें तो भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपनी जरूरतों के अनुसार विभिन्न लड़ाकू विमान विकल्पों का मूल्यांकन करती रही है। किसी भी रक्षा खरीद में केवल स्टील्थ तकनीक ही नहीं, बल्कि रखरखाव लागत, उपलब्धता, तकनीकी हस्तांतरण, परिचालन आवश्यकताएं और दीर्घकालिक रणनीतिक जरूरतें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में F-35 को लेकर सामने आ रही चुनौतियां वैश्विक रक्षा विश्लेषकों और संभावित खरीदार देशों के लिए निश्चित रूप से चर्चा का विषय बनी हुई हैं।



