ईरान का BRICS प्लान: ट्रंप की नाकेबंदी के बीच भारत के सामने बड़ा फैसला

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच BRICS के मंच पर तेहरान ने पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था से अलग विकल्प मजबूत करने की पहल की है। ईरान की ओर से BRICS देशों के बीच वैकल्पिक भुगतान तंत्र और वित्तीय कनेक्टिविटी बढ़ाने का विचार ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरानी बैंकों और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन पर दबाव बना हुआ है।
ईरान का ‘फाइनेंशियल कॉरिडोर’ प्लान क्या है?
ईरान चाहता है कि BRICS देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ाएं। इसका व्यापक लक्ष्य डॉलर और पश्चिमी नियंत्रित वित्तीय नेटवर्क पर निर्भरता कम करना है। इसमें सीमा-पार भुगतान, बैंकिंग कनेक्टिविटी और डिजिटल वित्तीय साधनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में सहयोग शामिल हो सकता है।
यह विचार BRICS में पहले से चल रही डी-डॉलराइजेशन की बहस से जुड़ा है। हालांकि, इसे तत्काल SWIFT के पूर्ण विकल्प के रूप में देखना सही नहीं होगा। BRICS देशों के बीच व्यापार और भुगतान व्यवस्था को एकीकृत करना तकनीकी, नियामकीय और राजनीतिक रूप से काफी जटिल प्रक्रिया है।
ट्रंप के प्रतिबंधों के बीच क्यों अहम?
ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था में मुश्किलों का सामना कर रहा है। अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंधों का असर ईरान के तेल कारोबार, बैंकिंग और विदेशी मुद्रा लेनदेन पर पड़ता है।
ऐसे में BRICS के जरिए वैकल्पिक भुगतान चैनल विकसित करना तेहरान के लिए प्रतिबंधों के असर को कम करने का रणनीतिक विकल्प हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी प्रतिबंध स्वतः खत्म या निष्प्रभावी हो जाएंगे।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
इस पूरे प्लान में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है और ईरान के साथ ऊर्जा, व्यापार तथा चाबहार बंदरगाह के जरिए रणनीतिक संबंध रखता है।
भारत के सामने यहां दोहरी चुनौती है। एक ओर वह BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था का समर्थन करके अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, ईरान से जुड़े किसी ऐसे वित्तीय तंत्र में शामिल होने पर उसे अमेरिकी प्रतिबंधों और द्वितीयक प्रतिबंधों के जोखिम का भी आकलन करना होगा।
क्या BRICS डॉलर को चुनौती दे सकता है?
BRICS में डॉलर पर निर्भरता घटाने की चर्चा लगातार तेज हुई है, लेकिन एक साझा BRICS मुद्रा या SWIFT का तत्काल विकल्प अभी वास्तविकता नहीं है। सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं, मौद्रिक नीतियां और वित्तीय प्रणालियां काफी अलग हैं।
फिलहाल ज्यादा व्यावहारिक रास्ता स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार, सीमा-पार भुगतान प्रणालियों की कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क के बीच सहयोग बढ़ाना है।
ईरान का दांव कितना सफल होगा?
ईरान का प्रस्ताव BRICS को केवल राजनीतिक समूह से आगे बढ़ाकर वित्तीय और आर्थिक सहयोग के अधिक प्रभावी मंच में बदलने की कोशिश का हिस्सा माना जा सकता है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत, चीन, रूस और दूसरे सदस्य देश किस हद तक वास्तविक वित्तीय ढांचे और भुगतान नेटवर्क में सहयोग करने को तैयार होते हैं।
इसलिए फिलहाल इसे ट्रंप की नाकेबंदी तोड़ने वाला कोई तत्काल “मास्टरस्ट्रोक” कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन अगर BRICS देश वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बड़े पैमाने पर लागू करने में सफल होते हैं, तो इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और डॉलर की भूमिका पर दीर्घकालिक असर जरूर पड़ सकता है।



