BCI Chief Manan Kumar Mishra: 14 साल से अध्यक्ष, NALSAR विवाद के बाद उठे पेशेवर आचरण पर सवाल

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा इन दिनों NALSAR यूनिवर्सिटी विवाद को लेकर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। BCI ने पहले हैदराबाद स्थित NALSAR University of Law के 2026 बैच के छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। यह कार्रवाई उन छात्रों के विरोध से जुड़ी थी, जिन्होंने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर CJI सूर्यकांत को बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, व्यापक विरोध के बाद BCI ने अपना फैसला वापस ले लिया।
14 साल से BCI की कमान
मनन कुमार मिश्रा लंबे समय से BCI के नेतृत्व में हैं और करीब 14 वर्षों से संस्था के अध्यक्ष पद पर रहे हैं। वह सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ 2024 से राज्यसभा सांसद भी हैं। 2025 में उन्हें लगातार सातवीं बार BCI अध्यक्ष चुने जाने की जानकारी सामने आई थी।
लंबे कार्यकाल के कारण NALSAR विवाद के बाद उठी आलोचना केवल एक फैसले तक सीमित नहीं रही, बल्कि BCI की निर्णय प्रक्रिया, जवाबदेही और नेतृत्व शैली को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।
NALSAR छात्रों पर कार्रवाई से शुरू हुआ विवाद
विवाद तब बढ़ा जब BCI ने NALSAR के 2026 में स्नातक होने वाले छात्रों के अधिवक्ता नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, कार्रवाई का संबंध उन छात्रों से था जिन्होंने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था। BCI के शुरुआती रुख में इस विरोध को न्यायपालिका के प्रति असम्मान के रूप में देखा गया।
इस फैसले की आलोचना इसलिए हुई क्योंकि छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध और उनके पेशेवर भविष्य के बीच संबंध स्थापित करने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियामक शक्ति के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठे।
कुछ ही घंटों में BCI का यू-टर्न
विवाद बढ़ने के बाद BCI ने पहले अपने आदेश में बदलाव किया और बाद में 2026 बैच के खिलाफ कार्रवाई पूरी तरह वापस लेने की घोषणा की। मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं, बार सदस्यों और छात्रों की प्रतिक्रियाओं पर विचार करने के बाद BCI इस निष्कर्ष पर पहुंची कि छात्रों की किसी गलत गतिविधि में भूमिका नहीं थी।
इसके बाद मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से छात्रों से माफी मांगते हुए कहा कि कानून के छात्रों को अपने विचार और राय रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
CJI सूर्यकांत ने भी जताई आपत्ति
इस विवाद में CJI सूर्यकांत की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रही। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने BCI के हस्तक्षेप पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह मामला उनके और छात्रों के बीच था। इससे BCI के शुरुआती आदेश पर सवाल और गहरे हुए।
BCI की शक्तियों पर भी बहस
BCI देश में अधिवक्ताओं के पेशेवर मानकों और कानूनी शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण नियामकीय कार्य करता है। इसलिए उसके फैसलों का कानून के छात्रों और वकीलों के करियर पर सीधा असर पड़ सकता है।
इसी वजह से NALSAR प्रकरण में यह सवाल उठा कि क्या किसी छात्र के विचार या विरोध को उसके पेशेवर नामांकन से जोड़ना BCI की नियामकीय शक्तियों की सीमा के भीतर है? इस पर कानूनी और अकादमिक हलकों में बहस जारी है।
अब NLSIU में भी विरोध
NALSAR विवाद का असर अन्य लॉ स्कूलों तक भी पहुंचता दिख रहा है। बेंगलुरु स्थित NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने CJI सूर्यकांत तथा BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई है। 700 से अधिक छात्रों के विरोध की खबर सामने आई है।
यह घटनाक्रम बताता है कि विवाद अब केवल एक विश्वविद्यालय या एक आदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लॉ स्कूलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अकादमिक स्वायत्तता और नियामक संस्थाओं की भूमिका पर व्यापक बहस का रूप ले रहा है।
BCI के खर्चों को लेकर भी सवाल
NALSAR विवाद के बीच BCI के कामकाज और खर्चों को लेकर भी सार्वजनिक सवाल उठे हैं। कुछ आलोचकों ने बैठकों, सम्मेलनों और यात्रा पर होने वाले खर्चों का मुद्दा उठाया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, BCI के ऑडिटेड आंकड़ों में वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान गतिविधियों और बैठकों पर करीब 14.22 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। हालांकि, इन खर्चों को अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
विवाद ने क्या सवाल खड़े किए?
पूरे घटनाक्रम से तीन बड़े सवाल सामने आते हैं:
- नियामक संस्था को छात्रों के विरोध और असहमति से निपटने में कितनी शक्ति इस्तेमाल करनी चाहिए?
- BCI जैसे संस्थान के फैसलों में पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो?
- लंबे समय से शीर्ष पद पर रहने वाले नेतृत्व की स्वतंत्र समीक्षा और संस्थागत निगरानी किस तरह हो?
कुल मिलाकर, NALSAR प्रकरण ने मनन कुमार मिश्रा और BCI के नेतृत्व को नए सिरे से बहस के केंद्र में ला दिया है। शुरुआती नामांकन-रोक आदेश का तेजी से वापस लिया जाना और उसके बाद माफी मांगना विवाद को शांत करने की कोशिश जरूर है, लेकिन BCI की निर्णय प्रक्रिया, छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियामक शक्ति की सीमाओं को लेकर उठे सवाल अभी बने हुए हैं।



