भारत की ड्रैग स्टोरी: पौराणिक कथाओं से आधुनिक मंच तक

भारत में ड्रैग की कहानी काफी पुरानी और विविध परंपराओं से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं, लोकनाट्य और रंगमंच में ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं, जहां कलाकारों ने अलग-अलग लिंग की भूमिकाओं को वेशभूषा और अभिनय के जरिए मंच पर प्रस्तुत किया। इसी वजह से भारतीय संदर्भ में ड्रैग को केवल पश्चिमी संस्कृति से आई आधुनिक कला मानना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
भारतीय प्रदर्शन परंपराओं में कलाकारों का किसी दूसरे लिंग के पात्र का रूप धारण करना लंबे समय से देखने को मिलता रहा है। धार्मिक कथाओं और लोक रंगमंच में देवी-देवताओं तथा पौराणिक पात्रों को जीवंत करने के लिए विशेष वेशभूषा, मेकअप और अभिनय का इस्तेमाल किया जाता रहा है।
आधुनिक दौर में यही प्रदर्शन शैली नए मंच, संगीत, फैशन और मनोरंजन के साथ ड्रैग आर्ट के रूप में दिखाई देती है। आज ड्रैग कलाकार अपनी प्रस्तुति के जरिए अभिनय, नृत्य, मेकअप, कॉमेडी और फैशन को एक साथ जोड़ते हैं।
ड्रैग संस्कृति की खासियत यह भी है कि इसमें कलाकार मंच पर एक अलग व्यक्तित्व और रूप गढ़ता है। इसलिए यह केवल वेश बदलने या मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदर्शन, पहचान और रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भी बन सकता है।
भारत में आधुनिक ड्रैग मंच ने सोशल मीडिया, नाइटलाइफ और पॉप कल्चर के जरिए नई पहचान बनाई है। हालांकि इसकी जड़ें समझने के लिए भारतीय लोक और रंगमंच परंपराओं को भी देखना जरूरी है। यही परंपरा और आधुनिकता का मेल भारत की ड्रैग स्टोरी को अलग पहचान देता है।



