इस्लामिक NATO में बांग्लादेश की एंट्री पर क्यों अड़ंगा? सऊदी फैक्टर समझें

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। इस समझौते के तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से इसे कई विश्लेषक अनौपचारिक तौर पर ‘इस्लामिक NATO’ की संज्ञा दे रहे हैं, हालांकि इसकी संरचना अभी NATO जैसी नहीं है।
बांग्लादेश ने भी इस रक्षा ढांचे में शामिल होने में रुचि दिखाई है। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि ढाका ने मक्का डिफेंस पैक्ट को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सलाहकारों की ओर से भी पहले इस तरह के आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने की संभावना के संकेत दिए गए थे।
हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार बांग्लादेश की राह आसान नहीं होगी। सबसे अहम सवाल सऊदी अरब की रणनीतिक प्राथमिकताओं का है। विश्लेषण में कहा गया है कि रियाद भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को भी महत्व देता है। सऊदी अरब के विजन 2030 के तहत भारत उसके लिए व्यापार, निवेश और आर्थिक विविधीकरण का महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे में ऐसा कोई कदम जो दक्षिण एशिया में भारत के साथ तनाव बढ़ाने वाला माना जाए, सऊदी अरब के लिए असहज हो सकता है।
दूसरी चुनौती पाकिस्तान की भूमिका से जुड़ी है। बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच हाल के वर्षों में संबंधों में सुधार के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन 1971 के इतिहास और पाकिस्तान की सैन्य छवि के कारण ढाका के लिए किसी सैन्य गठबंधन में शामिल होना संवेदनशील फैसला होगा। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बांग्लादेश की अपनी सैन्य और रणनीतिक क्षमता को देखते हुए उसे इस गठबंधन में क्या योगदान देना होगा, यह बड़ा सवाल है।
फिलहाल बांग्लादेश की ओर से मक्का पैक्ट में शामिल होने की कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इसे संभावित कूटनीतिक विकल्प के तौर पर देखना ज्यादा उचित है। अगर ढाका वास्तव में इस रक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनता है, तो इसका असर भारत-बांग्लादेश संबंधों के साथ-साथ दक्षिण एशिया के रणनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।



