मध्यप्रदेश में एक अजीबो-गरीब और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां सिर्फ 24 लीटर पेंट लगाने के नाम पर 443 मजदूर, 215 मिस्त्री और 3 लाख रुपये से अधिक का बिल पेश कर दिया गया। यह मामला प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की चरम सीमा को दर्शाता है। इतनी कम मात्रा में पेंट लगाने के लिए सैकड़ों मजदूर और मिस्त्री की आवश्यकता कैसे पड़ी? यह सवाल अब पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है। जांच एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जा रहा है। यह मामला न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग को उजागर करता है, बल्कि पारदर्शिता की कमी को भी सामने लाता है।
मध्यप्रदेश में सरकारी रिकॉर्ड्स में दर्ज यह पेंटिंग का कार्य एक उदाहरण बन चुका है कि कैसे सरकारी योजनाओं का पैसा सिर्फ कागज़ों पर बहाया जाता है। 24 लीटर पेंट का उपयोग करके जो काम कुछ घंटे में दो से चार लोग कर सकते थे, उसे दिखाया गया कि उसमें 443 मजदूर और 215 मिस्त्री लगे। यह आंकड़े सिर्फ हैरान करने वाले नहीं हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि योजना के नाम पर किस हद तक गड़बड़ियां की जा रही हैं।
इतनी बड़ी संख्या में मज़दूर और मिस्त्रियों की उपस्थिति दिखाना न केवल फर्जीवाड़ा है, बल्कि सरकारी तंत्र की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास भी है। इसमें यह भी साफ नहीं किया गया कि मजदूरों ने कितने घंटे काम किया, उन्हें मजदूरी कैसे दी गई और यह खर्च किस मद से हुआ। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि कई नाम फर्जी हैं और कई तो मृत लोगों के नाम तक सूची में दर्ज हैं।
साधारण बाजार दर के अनुसार 24 लीटर पेंट की कीमत लगभग ₹6,000–₹10,000 के बीच होती है। ऐसे में 3 लाख रुपये का खर्च बताना अपने आप में संदेहास्पद है। यहां तक कि यदि ब्रश, रोलर, मजदूरी और अन्य सभी खर्च जोड़ भी दिए जाएं, तो यह आंकड़ा बहुत ज्यादा है। इससे यह साफ होता है कि बिलों को फुला-फुला कर दिखाया गया ताकि सरकारी फंड का दुरुपयोग किया जा सके।



