बिहार में वोटर लिस्ट में संशोधन को लेकर नया विवाद सामने आया है, जो अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने चुनाव आयोग (EC) के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें बिहार में मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया को लागू किया गया था। ADR का आरोप है कि यह आदेश पारदर्शिता के मानकों पर खरा नहीं उतरता और इससे मतदाता सूची में गड़बड़ी की आशंका बढ़ जाती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह कदम चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी कर दिया है और जल्द ही इस पर विस्तृत सुनवाई हो सकती है।
ADR ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह आग्रह किया है कि चुनाव आयोग द्वारा जारी किया गया संशोधन आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि वोटर लिस्ट का संशोधन यदि पारदर्शी ढंग से न हो, तो इसका सीधा असर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों पर पड़ सकता है। ADR ने आशंका जताई कि यह आदेश मतदाता सूची में फर्जी नाम जोड़ने या वैध नाम हटाने का जरिया बन सकता है।
वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि उसने यह निर्णय चुनावों की तैयारी और मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया के तहत लिया है। EC का तर्क है कि संशोधन का यह कार्य पूरी पारदर्शिता के साथ किया जा रहा है और मतदाता पोर्टल तथा BLO के माध्यम से जनसामान्य को अपनी जानकारी अपडेट करने का पूरा मौका दिया जा रहा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी संशोधन कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत ही होंगे।
यह पहली बार नहीं है जब वोटर लिस्ट को लेकर विवाद हुआ है। इससे पहले भी कई राज्यों में मतदाता सूची में फर्जी नाम, दोहरी प्रविष्टियां और योग्य मतदाताओं के नाम हटाने जैसी शिकायतें सामने आ चुकी हैं। इन मामलों ने बार-बार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं। बिहार में यह मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि राज्य में आगामी समय में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं।



