देशबड़ी खबर

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: ‘खाना न बनाने पर ताना क्रूरता नहीं’

बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में 27 साल पुराने एक वैवाहिक विवाद में ऐतिहासिक और बहस योग्य फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी को “खाना न बनाने” को लेकर दिए गए ताने को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट का यह निर्णय केवल एक व्यक्तिगत मामले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने वैवाहिक संबंधों में “मानसिक क्रूरता” की परिभाषा को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस फैसले के बाद समाज में, खासकर कानूनी और सामाजिक क्षेत्रों में, इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि वैवाहिक जीवन में कौनसी बातें “मानसिक उत्पीड़न” या “क्रूरता” की श्रेणी में आती हैं और कौनसी नहीं।

यह मामला 1996 से चला आ रहा था, जिसमें पत्नी ने पति पर यह आरोप लगाया था कि वह उसे लगातार खाना न बनाने के लिए ताने देता था, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान रहती थी। इसके अलावा भी कुछ छोटे-मोटे आरोप लगाए गए, लेकिन मुख्य तर्क इसी बात पर केंद्रित था कि पति का व्यवहार अपमानजनक और लगातार तनाव देने वाला था। पत्नी ने इसे मानसिक क्रूरता करार देते हुए तलाक की मांग की थी। वहीं पति का पक्ष था कि यह ताने किसी दुर्भावना या मानसिक उत्पीड़न के उद्देश्य से नहीं, बल्कि केवल घरेलू असहमति के तहत थे और वैवाहिक जीवन में इस तरह की बातों को “क्रूरता” मान लेना असंतुलन पैदा कर सकता है।

मामला पहले फैमिली कोर्ट में गया, जहां पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया गया था। बाद में यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा, जहां विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने यह फैसला सुनाया कि “महज खाना न बनाने को लेकर ताना देना, यदि वह सतत और जानबूझकर अपमानजनक तरीके से न दिया गया हो, तो उसे मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।” कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद और असहमति होना सामान्य बात है, और हर असहमति या असुविधाजनक अनुभव को “क्रूरता” मानना वैवाहिक संस्था के लिए खतरनाक हो सकता है।

कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि पति या पत्नी के व्यवहार से दूसरे पक्ष को गंभीर मानसिक क्षति पहुंची हो, या उसके आत्म-सम्मान को गहरा आघात लगा हो। अगर यह साबित न हो पाए तो केवल असहमति या व्यवहारिक टकराव को क्रूरता नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि “हर विवाद तलाक का कारण नहीं होता और न ही हर ताना मानसिक उत्पीड़न का प्रमाण होता है।”

इस फैसले से एक तरफ जहां पति को राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर यह फैसला महिला अधिकार संगठनों के बीच आलोचना का विषय भी बन गया है। कई कार्यकर्ताओं ने कहा कि इस फैसले से घरेलू हिंसा के मामलों को हल्के में लेने का रास्ता खुल सकता है। उनका मानना है कि मानसिक क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा से नहीं होती, बल्कि शब्दों, व्यवहार और रोज़ के तानों से भी हो सकती है। दूसरी ओर, कुछ कानूनी विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अदालत ने एक संतुलित नजरिया अपनाया है और यह फैसला “गलत तरीके से किए गए मुकदमों” को रोकने में सहायक हो सकता है।

Computer Jagat 24

Founded in 2018, Computer Jagat24 has quickly emerged as a leading news source based in Lucknow, Uttar Pradesh. Our mission is to inspire, educate, and outfit our readers for a lifetime of adventure and stewardship, reflecting our commitment to providing comprehensive and reliable news coverage.

संबंधित समाचार

Back to top button