मद्रास हाई कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि “ईडी कोई सुपरकॉप नहीं है जिसे हर मामले की जांच का अधिकार हो।” यह तीखी टिप्पणी कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें ईडी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जांच की कोशिश की थी। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून की अपनी सीमाएं होती हैं, और कोई भी जांच एजेंसी संविधान से ऊपर नहीं है।
मामला एक स्थानीय कारोबारी से जुड़ा है, जिस पर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत कार्यवाही शुरू कर दी थी, जबकि उस व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी किसी वित्तीय अपराध से संबंधित नहीं थी। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब किसी अपराध में आर्थिक अनियमितता या विदेशी मुद्रा का लेनदेन सिद्ध ही नहीं हुआ है, तो ईडी क्यों और कैसे अपनी जांच शुरू कर रही है?
कोर्ट ने कहा कि ईडी को ‘हर चीज़ में कूद पड़ने वाली सुपरकॉप’ की भूमिका में नहीं देखा जा सकता। अगर किसी एजेंसी को यह लगने लगे कि वह हर केस में दखल दे सकती है, तो यह न केवल कानून के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है, बल्कि आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी हनन है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जांच एजेंसियों को अपनी सीमा और अधिकारों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए, वरना कानूनी प्रणाली का संतुलन बिगड़ सकता है।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश भर में ईडी की कार्रवाइयों को लेकर लगातार विवाद उठते रहे हैं, खासकर राजनीतिक दलों और कारोबारी जगत से जुड़े मामलों में। विपक्षी पार्टियां पहले से ही ईडी पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाती रही हैं।
मद्रास हाई कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी न सिर्फ ईडी के अधिकारों की पुनर्समीक्षा का संकेत है, बल्कि यह भी बताती है कि न्यायपालिका जांच एजेंसियों के असीमित दखल के खिलाफ सजग है। इस मामले ने एक बार फिर एजेंसियों की भूमिका और उनकी सीमाओं पर राष्ट्रीय बहस को हवा दे दी है।



